Saturday, 15 December 2012

जँहा बात करने से असान है बलात्कार करना

हम सचमुच घूरने वाले समाज के सदस्य हैं. दुनिया में गूगल पर सेक्स सर्च करने में हमारी टक्कर सिर्फ पाकिस्तान से है. जो जितना तहजीब वाला माना जाता है, उसे देखना और घूरना उतना ही ज्यादा भाता है. सेक्स शब्द सर्च करने वाले शहरों में लखनऊ अव्वल है तो पोर्न स्टार सनी लियोनी को इंटरनेट पर देखने की ख्वाहिश हरिद्वार में खूब उबाल मारती है. कामसूत्र इस देश का ऑल टाइम बेस्ट सेलर है और मोहल्ले के अंकलजी की सीडी की दुकान सुसंस्कृत लोगों के बूते नीली फिल्मों से लदी-फंदी रहती है. देखने और घूरने की परंपरा कोई आज की नहीं है. पूजा स्थलों में भी अक्सर संभोगरत मूर्तियां देव मूर्तियों के साथ बराबरी से होड़ करती हैं. देवदासी प्रथा इसी देश की हकीकत है. कई बाबाओं की प्रतिष्ठा सेक्स स्कैंडल्स की वजह से है.यह समाज इसलिए भी अद्भुत है क्योंकि यहां बलात्कार के लिए ‘इज्जत लुट जाने’ जैसे मुहावरे हैं. अपराध करने वाले की इज्जत नहीं लुटती, पीड़ित की इज्जत लुट जाती है. भाषा के संस्कार भी बेहद अजीब हैं. माता-पिता कन्या-दान करते हैं, मानो कोई वस्तु है, जिसे दान में देना है. बचपन से लड़कियों को पराया धन होने का पाठ पढ़ाया जाता है और कंधे झुकाकर चलने का सलीका सिखाया जाता है. आज भी देश के ढेरों कॉलेज ऐसे हैं, जहां लड़कियों को अलग बिठाया जाता है, मानो लड़की नहीं, छूत की बीमारी हो, कि छूने से कुछ बिगड़ जाएगा. लेकिन इन्हीं कॉलेजों के लड़के जाकर सिनेमा हॉल में अर्ली मॉर्निंग शो की सीटें भर देते हैं.ऐसे समाज में जो दिन-रात सेक्स की सोच में डूबा हो, वहां सेक्स पर बात करना इतना कठिन क्यों है? क्या हम सेक्स को लेकर डरे हुए लोग हैं. बलात्कार के आंकड़ों से क्राइम रिकॉर्ड को बुलंद रखने वाला मर्द समाज एक लड़की या महिला से बातचीत करते हुए इतना घबराता क्यों हैं? क्या लड़की उसके लिए सिर्फ एक मादा है, जिससे सेक्स करना है और कुछ नहीं? क्या वह उसी तरह की एक प्राणी नहीं है? एक लड़की जब अपनी पसंद से अपने लिए पार्टनर चुनना चाहती है, तो यह भयभीत समाज बौखलाकर उसकी हत्या तक कर देता है.सवाल यह है कि भारतीय समाज सेक्स से डरता है या महिलाओं की आजादी से?शुक्र है कि हमारा समाज धीरे-धीरे ही सही पर खुल रहा है. छोटे शहरों तक खुलेपन की एक हल्की सी लहर ही सही, पहुंच रही है. महिलाओं का वर्किंग स्पेस में आना और उनका आर्थिक रूप से समर्थ होना पूरे परिदृश्य को बदलने की ताकत रखता है. औरतों के लिए भी चुनने की आजादी अब वास्तविकता बन रही है. औरतों की आजादी भारतीय समाज को निर्णायक रूप से बदल देगी. स्त्री-पुरुष संबंधों का लोकतंत्र किसी भी समाज के सभ्य होने की दिशा में बढ़ने की पहली शर्त है. हम देर-सबेर इस शर्त को पूरा कर पाएंगे, ऐसी कामना की जानी चाहिए. फिर एक ऐसा समय भी आएगा जब हम बिना झिझक के और डरे बगैर सेक्स के बारे में भी बात कर पाएंगे. - BY-  Dilip C Mandal


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पुजारी या हवस के शिकारी (BBC NEWS, 11th Dec )


 मंगलवार, 11 दिसंबर, 2012 को 08:48 IST तक के समाचार (बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद)

अपनी समस्याओं के लेकर हैदराबाद में 500 देवदासियां एक जन सुनवाई में एकत्र हुई.


लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये घिनौनी प्रथा आज भी जारी है.आंध्र प्रदेश में लगभग 30 हज़ार देवदासियां हैं जो धर्म के नाम पर शारीरिक शोषण का शिकार होती हैं. 

इसकी वजह लक्ष्मम्मा कुछ यू बयां करती हैं,"मेरे माता-पिता की तीनों संतानें लड़कियां थीं. दो लड़कियों की तो उन्होंने शादी कर दी लेकिन मुझे देवदासी बना दिया ताकि मैं उनके बुढ़ापे का सहारा बन सकूं.”आंध्र प्रदेश की लक्ष्मम्मा अधेड़ उम्र की हैं और उनके मां-बाप ने भी उन्हें मंदिर को देवदासी बनाने के लिए दान कर दिया.
आज भी आंध्र प्रदेश में, विशेषकर तेलंगाना क्षेत्र में दलित महिलाओं को देवदासी बनाने या देवी देवताओं के नाम पर मंदिरों में छोड़े जाने की रस्म चल रही है.
लक्ष्मम्मा देवदासी होने की पीड़ा जानती हैं, वो प्रथा जिसमें उन्हें खुद उनके माता-पिता ने ढकेला था.

शारीरिक शोषण

"ऐसे सारे बच्चों का डीएनए टेस्ट करवाया जाए ताकि उन के पिता का पता लग सके और उन की संपत्ति में इन बच्चों को भी हिस्सा मिल सके."
लक्ष्मम्मा, अध्यक्ष,पोराटा संघम
लक्ष्मम्मा मानती हैं कि उनका भी शारीरिक शोषण हुआ लेकिन वो अपना दर्द किसी के साथ बांटना नहीं चाहतीं.
देवदासियों की जन सुनवाई में शामिल और दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर विमला थोराट कहती हैं, "देवदासी बनी महिलाओं को इस बात का भी अधिकार नहीं रह जाता कि वो किसी की हवस का शिकार होने से इनकार कर सकें".
जिस शारीरिक शोषण के शिकार होने के सिर्फ जिक्र भर से रुह कांप जाती हैं, उस दिल दहला देने वाले शोषण को सामना ये देवदासियां हर दिन करती हैं.
ये दर्द इकलौती लक्ष्मम्मा का नहीं है, आंध्र प्रदेश में लगभग 30 हज़ार देवदासियां हैं जो धर्म के नाम पर शारीरिक शोषण का शिकार होती हैं.
लेकिन लक्ष्मम्मा बाकी देवदासियों की तरह बदकिस्मत नहीं थीं ना ही उनमें किसी हिम्मत की कमी थी.
जब लक्ष्मम्मा को मौका मिला तो न केवल वो उस व्यवस्था से निकल गईं बल्कि उसके खिलाफ संघर्ष में उठ खडी हुईं और आज वो इस व्यवस्था का शिकार बनने वाली महिलाओं के लिए आशा की एक किरण बन गई हैं.

देवदासियों का हाल

"देवदासी बनी महिलाओं को इस बात का भी अधिकार नहीं रह जाता की वो किसी की हवस का शिकार होने से इंकार कर सकें"
विमला थोराट, प्रोफेसर दिल्ली विश्वविद्यालय
लक्ष्मम्मा उस पोराटा संघम की अध्यक्ष हैं जो देवदासी व्यवस्था के विरुद्ध सामाजिक जागरूकता लाने के लिए काम कर रही है.
सभी लक्ष्मम्मा की तरह इस दलदल से नहीं निकल पातीं या कहें कि निकलने की हिम्मत नहीं कर पातीं.
निज़ामाबाद जिले की कट्टी पोसनी भी ऐसी ही एक महिला हैं.
कट्टी पोसनी कहती हैं "मेरी जो हालत है भगवान ना करे कि वो हालत किसी और की हो. मुझे केवल इसलिए देवदासी बनाया गया कि मेरा भाई बीमार रहता था. अब मैं इस से निकलना भी चाहूं तो नहीं निकल सकती क्योंकि अब मुझसे विवाह कौन करेगा और फिर मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहेगा".
लक्ष्मम्मा और लगभग 500 देवदासियां हाल ही में हैदराबाद में हुई एक जनसुनवाई के लिए इकट्ठा हुईं, जहां देवदासियों के हाल पर चर्चा की गई.
जनसुनवाई में देवदासी महिलाओं की समस्याओं पर भी चर्चा हुई जिसमें उन बच्चों का भी जिक्र आया जो इन नाजायज़ रिश्तों की पैदाइश हैं.

नाजायज़ बच्चों का हक

जन सुनवाई में अपनी बेटी के साथ मौजूद एक देवदासी.
एक और देवदासी अशम्मा कहती हैं, "केवल महबूब नगर जिले में ऐसे रिश्तों से पैदा हुए पांच से दस हज़ार बच्चे हैं. पहले उनका सर्वे होना चाहिए. इन बच्चों के लिए विशेष स्कूल और हॉस्टल होने चाहिए और उन्हें नौकरी मिलनी चाहिए ताकि वो भी सम्मान के साथ जीवन बिता सकें.”
इससे भी एक कदम आगे बढ़कर लक्ष्मम्मा ने मांग उठाई, "ऐसे सारे बच्चों का डीएनए टेस्ट करवाया जाए ताकि उनके पिता का पता लग सके और उनकी संपत्ति में इन बच्चों को भी हिस्सा मिल सके."
लक्ष्मम्मा कहती हैं कि ऐसा      करने से किसी पुरुष की देवदासी के नाम पर इन महिलाओं का शोषण करने की हिम्मत नहीं होगी.

इस समाचार की पुष्टि के लिए लिंक पर जाये http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/12/121210_devdasi_omer_pn.shtml

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अपनी जाति में ही शादी करने के लाभ ही लाभ

  • अपनी जाति में शादी कर के ही हम सिर्फ जाति और जातिवाद को जिन्दा रख सकते है।
  • अपनी जातिमें अगर हम शादी करे तो ही हमेशा जाती बनी रहेगी फिर तब ही हम बिना किसी महान कर्म किये ,जन्म के अधार पर् गर्व कर सकते है।
  • अपनी जाति में शादी करके हम जाती के अधार पर राजनिति कर सकते है और बिना कुछ किये अपने जात के लोगो का वोट ले सकते है।
  • अगर हम जाति के बाहर शादी करने लगेंगे तो कुछ  पीढियों के बाद पता ही नहीं चलेगा की कौन किस जाती का है और फिर ब्राह्मण लोगो का मंदिरों में 100% आरक्षण नहीं रह पायेगा।
  • अगर हम जाति के बाहर शादी करने लगेंगे और जाती मिट जाएगी तो फिर ये धार्मिक कर्म कांड कौन करेगा ? और फिर उसके पैसे और दान-दक्षिणा तो फिर कोई भी ले लेगा।
  • अगर जाति नहीं रहेगी तो फिर आरक्षण भी अपने आप समाप्त हो जायेगा, क्योकि पता ही नहीं चलेगा की कौन किस जाती का है तो आरक्षण किसको दे। फिर हम सिर्फ आरक्षण का विरोध कर के वोट कैसे लेंगे और अपने नेताओ को कैसे जिताएंगे?
  • अगर हम जाति के बहार शादी करने लगेंगे कई लोग जो जाती के तावे पर अपनी रोटी सकते है मुख्यतः ब्राह्मण को सबसे जयादा नुकसान होगा ,जो की पृथ्वी पर भगवान् के रूप है।
  • अगर जाति रही तो जब चाहे तब जाती के अधार पर लोगो का शोषण और भेदभाव किया जा सकता है। जब चाहे उनको फिर से उनको गुलाम बनाया जा सकता है। अगर गुलाम ही नहीं रहेंगे तो हम मालिक बन कर अच्छी जिंदिगी कैसे जियेंगे?
इसलिए आपलोगों से अनुरोध है की अपने प्यार और पसंद की लड़की और लड़के से शादी न करके जाती की लड़की और लड़के से शादी करे और इस जाति व्यवस्था को और मजबूत बनाये । और अगर कोइ कुछ बोले तो बोल दे हमारी मर्ज़ी हम जिससे शादी करे, हमारे माता-पिता ने भी किया था और ये हमारे घर और समाज की परम्परा है और हम इसको नहीं तोड़ सकते।और हम लोगो के साथ हम शोषण और भेद-भाव तो नहीं कर रहे, भले ही आप उनको नीच और छोटा समझ के उनसे रिश्ता नहीं जोड़ रहे हो । अगर जाति मिट गयी तो भारतीय हिन्दू संस्कृति पर बहुत ही बड़ा असर होगा। इसलिए अपनी जाती में शादी करके सदियों से चली आ रह इस परम्परा को जारी रखे , अपनी संस्कृति को बचाए रखने सहयोग करे।


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ना रहेगी जाति ना रहेगा आरक्षण

लोग रोज अखबारों में जाती के आधर पर किये गए शोषण  और भेदभाव की खबरे पढ़ते है फिर भी बात से इंकार करते हैं। बहुत से लोग इस विषय पर चर्चा भी नहीं करना चाहते ,यह कह कर टाल देते हैं की धीरे-धीरे जाती ख़त्म हो जाएगी। मै उनलोगों से ये सवाल करना चौंगा की आखिर धीरे-धीरे का क्या मतलब है, आप अपनी जाती पर आज भी गर्व कर ही रहे है , अपनी जाती में ही विवाह आज भी कर रहे है और आप कहते है धीरे-धीरे ख़त्म हॉप जाएगी कैसे???  मनुष्य में "जाति " प्रकृति ने नहीं बनायीं। यह एक ऐसी बीमारी है  जिसमे एक समुदाय  के लोग दुसरे समुदाय से खुद को श्रेष्ठ दिखने के लिए और दुसरो को  नीच शाबित करने के लिए इस्तेमाल करते  हैं।  ये बात सही है की है आज हमारे समाज में जाती के अधार पर शोषण पहले के अपेक्षा बहुत कम हुआ है लेकिन गाँवों में यह अभी भी उसी तरह कहर ढाह रहा है , शहरो में भी जाती के आधार पर अलग रूप में  कई जगह भेद-भाव हो रहे हैं। ये बात शहर में रहने वालो को थोरा अटपटा लगेगा और खास कर के वैसे लोगो को जो अखबार की बिसनेस, खेल और मुख्या पृष्ठ के अलावा नहीं पढ़ते। ये बिलकुल दहेज़ प्रथा की तरह है , कानूनन रूप से वर्जित है लेकिन फिर भी कई जान ले रहा है, मैंने कुछ दिन पहले दैनिक जागरण अखबार में पढ़ा था की एक सवर्ण  जाती की शादी में दलित को बराबर की कुर्सी पर बैठने  पर गोली मार दिया। ऐसी ही खबर दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के है जिन्होंने सभी दलित छात्र को एक साथ फेल  कर दिया था, जाँच के बाद पता चला की प्रोफेसर कास्टिस्ट था। अगर गाँवो की खबरे पढ़े तो मिलता है की किसी सरकारी स्कूल में टीचर दलित बच्चो को कक्षा के बहार बैठाथा  था , पहले तथाकथित ऊँच जात के बच्चो को फिर दलितों को अगर उंच जाति का कोई बच्चा अनुपस्तिथ रहे फिर भी उनकी सिट खली रहती थी लेकिन उसमे दलित का बच्चे को बैठने नहीं दिया जाता। कभी दलितों की बेटी के साथ बलात्कार तो कभी मंदिर में प्रवेश निषेध जैसी खबरों  को देख कर क्या कोई कह सकता है की आज जाती की आधार पर सौतेला व्यवहार और भेद-भाव नहीं हो रहा???


यही कुछ खबरे नहीं जो आज के समाज में जाति के आधार पर भेद-भाव तथा शोषण की पुस्टी करती है, बल्कि ऐसा कोई दिन नहीं जिस दिन ऐसी घटना न हुई हो।आप शहर के गट्टर को साफ़ करने वाले, भंगी का काम करने वाले, चमड़ा उठाने वालो के बिच जाइये और देखिये की कितने ब्राह्मण, राजपूत और बनिया जाती के लोग वह काम करते हैं? एक भी नहीं।तो क्या ये सवाल स्वाभिक रूप से नहीं उठता की आज आजादी के 65 साल बाद ये वही काम क्यों कर रहे है, जो आजादी के पहले करते थे क्या इनको किसी का मल-मूत्र साफ़ करने में मजा आता है? क्या किसी को इसमें अच्छा जिंदिगी जीने का मन नहीं करता ?? नहीं ऐसा बिलकुल नहीं , किसी को भी आत्याचार, गरीबी और ऐसे काम करने में मजा नहीं आ सकता। फिर क्यों ये लोग ऐसी जिंदिगी जीने को मजबूर है?? सरकार इनपर ध्यान क्यों नहीं देती ? यही नहीं इनके बच्चों को भी यही काम करना पड़ेगा अगर ऐसा चलता रहा तो क्योकि इनके बच्चो को पढने के लिए स्कूल नहीं, खाने को रोटी नहीं, अगर किसी स्कूल में पढने जाते भी है तो ये काम नहीं करेंगे तो खायेंगे कैसे ?? हाँ , ये बात भी सही है की इसी जाती के कुछ लोग I.A.S./ I.P.S. जैसे अच्छे  पद पर भी है जो किसी तरह संयोग्य से आगे बढ़ पते है। लेकिन क्या हमलोगों को इन्हें संयोग्य  और किस्मत के भरोसे छोड़  देना चहिये ?


अगर इतना जानने के बाद भी आपको लगता है की जाति  नहीं है इस समाज में तो मै  आपसे कुछ  पूछना चाहता हूँ , की आपके परिवार और आसपास  में कितने लोगो के अंतर्जतिये विवाह हुए है , क्या आपने कभी अख़बार में वर-वधु वाला पेज नहीं देखा, क्या उस पेज में योग्यता और नाम से पहले जात नहीं लिखा नहीं देखा ? आपने अपनी जिन्दगी में कभी किसी ब्राह्मण, राजपूत,जाट या तथाकथित उंच जाति को अपने जात के ऊपर गर्व करते नहीं देखा?  क्या अपनी जाति  में हि शादी करना जाती-पति को बढ़ावा देना नहीं, क्या यह जाती के आधार पर भेद-भाव नहीं ?? क्या अगर हम अगर इसी तरह जाति देख कर शादी करते रहे तो क्या कभी जाती ख़त्म हो जाएगी? और जब तक जाती रहेगी तब तक उंच-नीच और भेद-भाव रहेगा। जाती को पूर्ण रूप से ख़त्म करने का एक उपाए है, अगर सब लोग बिना जात देखे सिर्फ अपनी पसंद और प्यार देख कर शादी करे तो एक पीढ़ी के बाद पता ही नहीं होगा की कौन किस जाती का है।और जब लोगो को अपनी जाति पता ही नहीं होगी तो स्वाभिक है की भेद-भाव और उंच-नीच अपने आप मिट जायेगा लेकिन जब तब हम ऐसा नहीं करते तब तक जाती रहेगा भले उसके आधार पर भेद-भाव में कमी आ जाये।

आब मै इस बात से सन्तुष्ट हु की मैं अपनी बात बताने में सफल रहा। अब मै पूर्ण रूप से कह सकता हूँ की अगर अब भी किसी को जाति की वजह से परेशानी नहीं दिखती तो जरुर उस व्यक्ति को आरक्षण और स्वार्थ की वजह से नहीं दिख रही उस लग रहा होगा की अगर मैंने ये स्वीकार कर लिया तो मियो इन दलित लोगो से आराक्सं कैसे छिन  सकूँगा? मई उस व्यक्ति को अस्वासन देता हो की तुम आरक्षण तब भी ख़त्म कर सकते हो बस अपने परिवार और अपने लोगो का विवाह दूसरी जाती में करा कर। ना रहेगी जाति ना रहेगा आरक्षण। लेकिन  जब तब तक आप दुसरे जाती को नीच समझ कर उसमे कितने भी योग्य व्यक्ति को अपनी बेटे या बेटे से विवाह  नहीं कराएगा क्योकि सिर्फ आप बड़े जात का होने पर गर्व कर सके तो तब तक आप भी आरक्षण को बढ़ावा दे रहे है,,, आरक्षण के विरुद्ध बोलने वाले हर  उस व्यक्ति से यही कहना चाहूँगा  की जाति ख़त्म करे आरक्षण अपने आप चली जाएगी।

Satyamev Jayate Untouchability - Dignity for Allhttp://www.youtube.com/watch?v=lJ3XV_6hJacIndia Untouched: Research Documentary!http://www.youtube.com/watch?v=lgDGmYdhZvUThe Death Of Merit - Manish Kumar (IIT Roorkee) http://www.youtube.com/watch?v=QA3wEeD4m2g&feature=relmfuhttp://www.youtube.com/watch?v=4SRzk8Sf32Q&feature=relmfuA 6 Year Old Girl Thrown On Fire For Walking On Upper Caste Roadhttp://www.youtube.com/watch?v=eP26sTtofyM&list=UU3y3_6jZYetKLM-GILeKJ_g&index=3&feature=plcphttp://www.youtube.com/watch?v=lgDGmYdhZvU

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ऊपर बताये गए जाति  के परिणाम को देखने और समझने में आसानी के लिए यहाँ कुछ लिनक्स दिए हुए है। कृपया इन्हें देखे और फिर कुछ विचार करे - LIKE http://www.facebook.com/indianeedrevolution


बलात्कार के कारण कपडे नहीं बल्कि मानसिकता है।

आज हमरे समाज में नारी उतपीडन  आम बात हो गयी है , लेकिन जब तक लोग नारियो को ही दोष लगते रहे उनके कपडे, उनके भाग्य को दोष देते रहे और जब तक ऐसा सोचेगे की  ये विधि का विधान है तब तक ये समस्या नहीं जाएगी। और अगर कपड़ो की वजह से बलात्कार होते हैं तो फिर बुरका पहनने वाली मुस्लिम महिलाओं के साथ इतनी बड़ी संख्या में बलात्कार कैसे होता है??? दोस्तों बलात्कार और शोषण कपड़ो की वजह से नहीं बल्कि मानसिकता  की वजह से होता है। ये समस्या तब तक नहीं जाएगी की तक हम पुरुष या मादा होने पर गर्व करना नहीं छोड़े और उन धार्मिक बत्तो को आंख मुद कर मानना नहीं छोड़े , जो औरत और पुरुष में भेद की बात करता हो , जो नारी को मरने और पीटने को इज्जाजत देता हो। आपने कुरआन में भी पढ़ा ही होगा की अगर आपकी पत्नी आज्ञाकारी नहीं हो तो आप उसे बस में करने के लिए मार सकते है। (रिफरेन्स -http://answering-islam.org/Silas/wife-beating.htm ) और अपने रामचरित्रमानस में भी प्रसिद्ध वाक्य पढ़ा होगा की " द्धोल, गंवार, शुद्र, पशु ,नारी सब है ताडन के अधिकारी।"  आप सभी जानते है की हमलोगों की  मानसिकता बहुत हद तक हम जिस धर्मं को फॉलो करते हैं उस पर निर्भर करती है। आप लोगो से मै  अपने धर्मो को छोड़ने की बात नहीं कर रहा पर धर्मं की हर एक बात बिना सोचे-समझे मान लेना कहा की बुद्धिमता है।  ये बात बिलकुल सही है की  आज नारी के ऊपर आत्याचार में कमी आई है, बहुत सारे परिवारों में बिलकुल भी भेद नहीं रहा। लेकिन कितने घरो और गाँवों में परिवर्तन आई है ये भी जानना जरुरी है। हमारे देश की गांवो की स्तिथि आप लोगो से छुपी नहीं ,  हमारे देश के गावो  को देख कर लगता ही नहीं की इक्कीसवी सदी के लोग वह रहते है , अपना इतिहास नजर आता है। और हमरे देश की लगबघ 70% आबादी इन्ही गावों में रहती है। पुरुष और स्त्री प्रकृति ने बनायीं। हर जिव में नर-मादा होते हैं , लेकिन लिंग के अधार पे भेदभाव सिर्फ इंसानों में हैं। बहुत से लोग ऐसा अवैज्ञानिक  दलील देते है की स्त्री पुरुष के अपेक्षा कमजोर होता है और कम योग्यता रखती है। अगर ऐसा 2 मिनट के लिए मन भी लिया जाये तो क्या जो व्यक्ति कम योग्यता रखता है उसे बराबरी के साथ जीने का अधिकार नहीं ?

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BABA SAHEB AMBEDKAR- EK MASIHA


B.R Ambedkar was the voice of 80 percent of the  population of India at the time of independence .He has struggled whole life for the betterment of backward society  of India  He was born on 14 April 1891 in Maharashtra in the poor  shudras family. At the time of his birth shudra was the  most backward community and comprised 80 percent of  the population. To take birth in shudra was the greatest sin  at that time. The life of shudra was more miserable  compared to the insect of sewage.  They had no access to study as it could have opened their  eyes. They had no right to property; they could earn only  to survive. They were the prey of extreme degree of  inequality and discrimination and also there was a system  of very harsh punishment for those who didn’t follow the  Dharma rule.  For example ---  Boiling oil were put into the ears of those who  listened to the words holy books, red hot iron  rod was to be inserted the eyes of those who  dared to look into the eyes of Brahmins, shudras  have to remain slave by birth, the ladies of  shudras were treated as the sex object by the  Brahmins, they were adjusted in a very small  corner far from the village, they were considered  untouchables and they had to carry broom on  their waist while walking because earth was  considered to become impure by their footprints  , they had no access to the mandir and God  because even God were considered to become  impure by their touch...and much more...  Brahmins law was imposed as a strict law of state. The  holy books of Hinduism were full of casteism, inequality,  discrimination, blind beliefs, heaven and hell, God and  Ghost. These holy books were designed to fulfill the  greed and lust of the Brahmins for power. These books  stated that miserable and dirty life of shudras was the  result of their deeds of previous life.  According to Brahmins they were born from the mouth of  Brahma, proving themselves as the most divine,  Kshatriyas to be born from the hands of Brahma, vashya  to be born from the stomach of Brahma and shudras to be  born from the foot off the Brahma, thus proving them to be  the most backward by God.  History shows that Brahmins were the fraud nomads from  middle Asia who visited India in 2500 BC. Their lust and  greed was highly encouraged after seeing the situation of  innocent people here. So they created hinduism as the  tool to rule over the country.  This is little glance of Hinduism. In this type of hellish  environment Baba Sahib was born.  There is no need to mention the amount of labour and  pain bared for his education; he not only struggled to study  here but also in abroad for further education.  After the thirty-five years of study and research on various  topics in various subjects, especially on Religion, he wrote  many books for the re-establishment of humanist and  socialist society.  He has not only written books for the upliftment of  backward/scheduled Hindus but also taught and  awakened the people by various reform program,  meetings, and demonstration. He stated that "Burn all the  black pages of Hindu religion which kept you in dark and  exploited you for such a long time."  He started the movement at a large scale to oppose the  policies oh Hinduism and dharma kanoon. He made  people to reject customs, tradition, and fears and believes  and practices. He taught them how to lead a good life and  fight for their rights. He also struggled to enforce equality,  fraternity and liberty into the Indian constitution. He  had a major role in reservation of backward/scheduled  caste in various field to uplift them up to the level of other  class of society.  It would not be wrong to say that he would have provided  equal opportunity to all the people of India had their not  been interruption from M.K Gandhi and his dramatized  ansans, equality would have been practiced by whole  India by now.  The ratio of today is not very different/less from that time LIKE http://www.facebook.com/indianeedrevolution TO SUBSCRIBE US.

RAMSWAROOP VERMA - A GREAT SOCIAL REFORMER & HUMANIST PHILOSOPHER


Ramswaroop Verma (1923-1998) was the founder of Arjak Sangh, a Lucknow based humanist organisation, which stresses social equality and is strongly opposed to Brahminism. Verma did not believe in the existence of God or soul. Besides, he was a strong opponent of fatalism and the doctrine of karma. Verma campaigned vigorously against Brahminism and untouchability. According to him, Brahminism is rooted in the doctrine of rebirth, and it is not possible to eradicate it without attacking the doctrine of rebirth and fatalism.
 
Verma says that "Brahminism is like a tree. The doctrine of rebirth is its root, and fatalism is its stem. Varna-vyavastha is like its branches, on which caste-system grows like leaves. The distinction of high and low are flowers of this tree, whereas exploitation is its fruit. Instead of attacking rebirth, fatalism and varna--vyavastha, the reformist movements, according to Verma, concentrated on removing leaves, flowers and fruits only. Verma strongly asserts that Brahminism cannot be reformed; it has to be negated totally." 
 
Biography 
 
Ramswaroop Verma was born on 22 August 1923, in Gaurikaran village of Kanpur district in U.P. His father's name was Vanshgopal and his mother's name was Sukhia. Verma's father was an agriculturist.  Verma, who was an intelligent student, had his school education in village schools. Verma was married to Siyadulari as a student, but his wife died soon. Verma's married life lasted only two years. He did not marry a second time in spite of pressure from family members.
 
Verma did his M.A. (Hindi) from Allahabad University in 1949. He secured first position in the first class in the University. He did his Law Graduation from Agra University, again securing first position in the first class. He registered himself as an advocate but he did not start practicing. He also qualified in the written examination of the Indian Administrative Services, but did not appear in the interview. By now, he was convinced that an administrator has to work within limitations. He wanted to serve the society as a free citizen. He came in contact of Acharya Narendra Dev and Dr. Ram Manohar Lohia and, subsequently became a member of the Socialist Party. He was elected to the U.P. Assembly several times. In 1967, he became Finance Minister of U.P. in the coalition government headed by Charan Singh.
 
After being active in party-politics for a long time, Ramswaroop Verma concluded that it was not possible to achieve political and economic equality without a social and cultural revolution. Consequently, he founded Arjak Sangh on 1 June 1968 for achieving this aim.
 
In 1972, Verma, who had left the Socialist Party by now, founded a new political party named Samaj Dal. He also started publishing Arjak Saptahik, a Hindi weekly of which he was the chief editor. In a parallel development Jagdeo Prasad, a socialist leader of Bihar, established a political party named Soshit Dal and started publishing and editing a Hindi weekly titled Soshit Saptahik. These two parties had similar policies and in 1972 itself they merged to form Soshit Samaj Dal with Ramswaroop Verma as the chairperson and Jagdeo Prasad as a general secretary. Both these leaders were champions of the rights of backward classes.
 
 Verma was influenced and inspired by Ambedkar among others. In April 1978, Arjak Sangh took up a programme of publicly burning Ramcharit Manas (Ramayana) and Manusmriti at several places in U.P. and Bihar.
 
Though Verma was active in party politics, he is best known as a thinker, writer and the founder of Arjak Sangh. He kept working for Arjak Sangh through his articles, books and lectures. He died in Lucknow on 19 August 1998.  
 
Publications 
 
Ramswaroop Verma wrote and spoke almost exclusively in Hindi. Manavwadi Prashnotri (Humanist Question-Answers), Kranti Kyon aur Kaise? (Revolution: Why and How?), Brahmanwad banam Manavwad (Brahmanism versus Humanism), Manusmriti Rashtra ka Kalank (Manusmriti a National Shame), Niradar kaise mite? (How to remove Disrespect?) and Achuton ki Samasya aur Samadhan (The Problem of Untouchables and its Solution) are some of his main books. The basic principles, programmes and the bylaws of Arjak Sangh are contained in a Hindi document titled Arjak Sangh Siddhanta Vaktavya - Vidhan - Karyakram (Arjak Sangh: Statement of Principles – Statute – Programme). 
 
Arjak Sangh 
 
The aim of Arjak Sangh, as mentioned in its bylaws, is to organize all communities, which believe in the superiority of physical labour, and to work for their social, economic and cultural advancement. The membership of the organization is open only for those born in communities engaged in physical labour. A community or caste in which at least ninety five per cent of men and women earn their livelihood by physical labour is regarded as “a community engaged in physical labour” or "Arjak". This means that persons born in Brahmin and other upper castes are not entitled to become members of Arjak Sangh. Thus, Arjak Sangh is a backward class organization.
 
In his preface to the basic document of Arjak Sangh, Verma has greatly emphasized "conscious human equality". According to Verma, human equality is something that comes naturally to human beings. In a healthy society, everyone will respect one another. This is what Verma means by "conscious equality".
 
Verma comes down very heavily on Brahminism for sanctioning inequality. According to him, Brahminism, which is based on the doctrines of rebirth and fatalism, sanctions slavery and inequality. Therefore, it can never liberate the masses. The aim of Arjak Sangh, according to Verma, is to liberate the large majority of poor Indians, who are denied respect, from the stranglehold of Brahminism, and to work for their happiness and prosperity by promoting egalitarian humanism 
 
Basic Principles
 
The first basic principle of Arjak Sangh is to treat physical labour as superior to mental labour. According to the document, mental labour can be helpful in producing something but it cannot achieve anything without physical labour. On the other hand, physical labour can produce things in a natural way. The upper castes of India have looked down upon physical labour. Brahmins, for example, who live by begging, do not feel ashamed in doing so. On the other hand, they look down upon Bhangis (Sweepers) who do hard and socially useful physical labour. The sections of society, which shun physical labour, created the caste system to sustain themselves. The Arjak Sangh, says the document, wants to establish the dignity of physical labour and to destroy the caste system. The Arjak Sangh wants complete social equality including gender equality.
 
 The basic document of the Arjak Sangh also emphasizes the economic advancement of the arjaks and contains a detailed programme for it. It envisages a cultural revolution to liberate the arjaks from the doctrines of rebirth and fatalism, which, according to it, has blunted their revolutionary consciousness. Further, the document wants arjaks to ignore the religious distinctions among them. Arjak Sangh, it says, will use the feeling of human welfare inherent in the basic principles of all religions to foil all attempts by non-arjaks to divide arjaks along religions lines. According to the document, Arjak Sangh regards religion (dharma) as that which leads to the conservation and prosperity of human society. Thus, in the view of Arjak Sangh, all religions are same as long as they try for the prosperity of human society. In this sense, no religion can propagate inequality in human society, because it will cease to be a religion if it does so. Arjak Sangh, declares the document, will view religions in this broad
 
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Jagdev Prasad - Lenin of Bihar


Jagdev Prasad (1922-1974) was a fearless leader from Bihar who fought for the cause of the backward and downtrodden sections of the society. Hailing from a humble background, the young Jagdev had to undergo many hardships to pursue his studies. He secured a Master’s Degree in Economics from the Patna University in 1950. He joined the Socialist Party and contributed his mite to fight social inequalities and economic exploitation, which continued to stain the social fabric of India, despite the attainment of freedom. In 1967, he contested for the 4th Bihar Assembly from Kurtha and emerged victorious. He played an important role in forming the first ever coalition government in Bihar with Mahamaya Prasad Singh as the Chief Minister. He left the Government and the Party in anguish and formed his own ‘Shosit Dal’. Jagdev Prasad was also noted for his suave penmanship. His journalistic career started in 1953 with ‘Janata’, the organ of the Socialist Party. Later, he also edited the English weekly, ‘Citizen’ and the Hindi weekly, ‘Uday’. The life and political career of Jagdev Prasad had an unfortunate end in 1974, when he received a bullet shot in his neck in the confusion which arose out of the police firing at a rally in Kurtha, which he was addressing.

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प्रभु आप संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं !

एक बड़ा घोटाला जो 3500 साल से चला आ रहा है ............. प्रभु आप संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं !...............

भक्तों ने देवी-देवताओं के लिए जो माल चढ़ाया, अगर वह देवी-देवताओं तक नहीं पहुंचा तो यह विश्व इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे लंबे
 समय तक चलने वाला घोटाला होगा.
पिछले 3500 सालों से लेकर आज की तारीख तक का दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला है: दान-दक्षिणा घोटाला. भगवान का कहना है कि इतने सालों में हमारे द्वारा चढ़ाये गए फल, दूध, चुनरी, नारियल, लंगोट, पैसा, चादर, गहने, सोना-चांदी, तेल-तिल का दान तो क्या, एक फूटी कौड़ी भी अभी तक उसके पास नहीं पहुँची. भगवान की स्थिति बहुत दयनीय है और उसने निर्णय लिया है कि उसके नाम पर मंदिर के अंदर बैठकर उसकी दलाली और कमीशन-एजेंटगिरी करने वाले लोगों पर वो केस करेगा. मुझे भगवान से पूरी सहानुभूति है.. प्रभु आप संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं !जो लोग देवी देवाताओं में विश्वास रखते है, उनका यह भी विश्वास है कि विश्व की निर्मिती देवी-देवाताओं ने की है. यानी धरती पर जो कुछ भी है उसे देवी-देवाताओं ने बनाया है.अगर यह सब चीजें देवी-देवाताओं ने ही मनुष्य और प्राणी के लिए ही निस्वार्थ भाव से बनाया है, तो भला मनुष्य देवी-देवाताओं की बनाई चीजें देवी-देवाताओं को ही प्रसाद-भेंट के रूप में कैसे चढ़ा सकता है?उन्हें उनकी बनाई हुई चीजें उन्हे ही वापस देकर उनसे अधिक की मांग कैसे कर सकता है? जबकि उनके अनुसार इनमें से एक भी चीज मनुष्य की पैदा की हुई नहीं है.अजीब लॉजिक है !
आभार Nilakshi Singh और दिलीप मंडल ओर फिल्म OH MY GOD को
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आखिर नालंदा विश्वविधालय क्यों जलाया ?

प्रसिद्ध इतिहासकार "राहुल सनस्क्रतीयान" की किताब "TIBET MAIN BAUDH DHARAM " पेज संख्या 312 से 318 देखे उसके कुछ अंश इस प्रकार है -बिहार का ऐतिहासिक नाम …मगध है,बिहार का नाम ‘बौद्ध विहारों’शब्द का विकृत रूप माना जाता है,इस की राजधानी पटना है जिसका पुराना नाम पाटलीपुत्र था.!आज आप को एक ऐसे दर्शनीय जगह लिए चलते हैं जिसके बारे में बहुत लोग जानते हैं.-बिहार में एक जिला है नालंदा…संस्कृत में नालंदा का अर्थ होता है “ज्ञान देने वाला” (नालम = कमल, जो ज्ञान का प्रतीक है; दा = देना).कहते हैं कि इस की स्थापना ४७० ई./४५० ई.[?] में गुप्त साम्राज्य के राजा कुमारगुप्त ने की थी। यह विश्व के प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था जहां १०,००० छात्र और २,००० शिक्षक रहते थे।भारत में दुनिया के सबसे पहले विश्वविद्यालय तक्षशिला विश्वविद्यालय की स्थापना सातवीं शताब्दी ईसापूर्व यानी नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना से करीब १२०० साल पहले ही हो गई थी। यह नालंदा भारत का दूसरा प्राचीन विश्वविद्यालय है, जिसका पुनर्निर्मा…ण किया जा रहा है। विश्वविद्यालय की स्थापना से काफी पहले यानी करीब १००० साल पहले गौतम बुद्ध के समय (५०० ईसापूर्व ) से ही नालंदा प्रमुख गतिविधियों का केंद्र रहा है।तमाम बौद्ध साक्ष्यों में उल्लेख है कि गौतमबुद्ध नालंदा में कई बार आए थे। वहां एक आम के बगीचे में धम्म के संदर्भ में विचार विमर्श किया था। आखिरी बार गौतम बुद्ध नालंदा आए तो मगध के सारिपुत्त ने बौद्ध धर्म में अपनी आस्था जताई। यह भगवान बुद्ध का दाहिना हाथ और सबसे प्रिय शिष्यों में एक था। केवत्तसुत्त में वर्णित है कि गौतम बुद्ध के समय नालंदा काफी प्रभावशाली व संपन्न इलाका था। शिक्षा का बड़ाकेंद्र बनने तक यह घनी आबादी वाला जगह बन गया था। विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद दुनिया के सबसे लोकप्रिय जगहों में शुमार हो गया। बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय में यहां अकाल पड़ने का भी उल्लेख है। गौतम बुद्ध का शिष्य सारिपुत्त तो नालंदा में ही पैदा हुआ और यहीं इसका निधन भी हुआ ( सारिपुत्त के निधन की जगह नालका की पहचान की इतिहासकारो ने नालंदा से की है।बौद्ध अनुयायी सम्राट अशोक ( २५०ईसापूर्व ) ने तो सारिपुत्त की याद में यहां बौद्ध स्तूप बनवायाथा। नालंदा तब भी कितना महत्वपूर्ण केंद्र था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह जैन धर्मावलंबियों के लिए भी महत्वपूर्ण केंद्र था। जैन तीर्थंकर महावीर ने जिस पावापुरी में मोक्ष प्राप्त किया था, वह नालंदा में ही था। नालंदा पाचवीं शताब्दी में आकर शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र में तब्दील हो गया।अब पुनः अपनी स्थापना से करीब १५०० साल बाद विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के फिर से दुनिया का वृहद शिक्षाकेंद्र बनाने की नींव पड़ गई है। आज राज्यसभा ने इससे संबंधित विधेयक को मंजूरी दे दी। गुप्तराजाओं के उत्तराधिकारी औरपराक्रमी शासक कुमारगुप्त ने पांचवीं शताब्दी में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। गुप्तों के बाद इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरर्राष्ट्रीयख्याति रही थी। सातवीं शती में जब ह्वेनसांग आया था उस समय १०००० विद्यार्थी और १५१० आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे।नालंदा विश्वविद्यालय में विद्यार्थी विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, तर्कशास्त्र, गणित, दर्शन, तथा हिन्दु और बौद्ध धर्मों का अध्ययन करते थे। चौथी से सातवीं ईसवी सदी के बीच नालंदा का उत्कर्ष हुआ।अध्ययन करने के लिए चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, इंडोनेशिया, इरान और तुर्की आदि देशो से विद्यार्थी आते थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन्सांग ने भी ईस्वी सन् ६२९ से ६४५ तक यहां अध्ययन किया था तथा अपनी यात्रा वृतान्तों में उसने इसका विस्तृत वर्णन किया है। सन् ६७२ ईस्वी में चीनी इत्सिंग ने यहाँ शिक्षा प्राप्त की।कहा जाता है कि नालंदा विश्वविध्यालय में चालीस हजार पांडुलिपियों सहित अन्य हजारों दुर्लभ हस्त लिखित पुस्तकें थी !खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था। एक प्राचीन श्लोक के अनुसार आर्यभट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। आर्यभट के लिखे तीन ग्रंथों की जानकारी आज भी उपलब्ध है। दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र।यहाँ के तीन बड़े बड़े पुस्तकालय के नाम थे -:1. रत्न सागर 2. विढ्ध्यासागर 3. ग्रंथागारबौद्ध धर्म असल में ब्राहमणवादी गलत कर्म कंडों और जातिगत बटवारे की खिलाफत के रूप में फल फूला और स्वीकार किया गया | समानता और समरसता, ऊच नीच फ़ैलाने वाले ये बात ब्राह्मणों को कतई बर्दास्त नहीं हो रही थी ,परिणाम स्वरुप ब्राह्मणों द्वारा षडीयन्त्र ही मौर्या साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण था| मौर्या साम्राज्य के पतन के बाद बौद्ध धर्म का कोई सरक्षक नहीं बचा और तब कट्टर हिन्दुओं ने सभी बौद्ध विहार, बौद्ध मूर्ती,विश्विद्यालय,साहित्य एव ईतिहास को नस्ट करना शुरू किया| इसी कड़ी में नालंदा विश्वविद्यालय की ऐसी दुर्गति करके भारत देश में से समानता और शिक्षा को बंद करके हिन्दू धर्म को थोपने के लिए मनुवादी संविधान लागू किया गया |नालंदा विश्वविद्यालय को इन महास्वार्थी लोगों ने तहस नहस कर दिया और पुस्तकालय में आग लगा दी, कहते हैं यह ६ माह तक जलती रही और आक्रांता इस अग्नि में नहाने का पानी गर्म करते थे.ये कहा जाता है की बौद्ध भिक्षुओं द्वारा किये सभी शोध इन पुस्तकालयों में सुरक्षित थी जो आज हम टेक्नोलोजी देख रहे है वो पहले है बन चुकी थी ! आज भी पुष्पक विमान बन सकता है जिसकी सरचना रावण संहिता में दिया गयी है ! और सभी चिकित्सा के शोध भी !आप अंदाज लगा सकते है कि जब आग लगाई गयी तो ६ महीनो तक जलती रही तो कितनी शोध और ग्रन्थ जले होंगे !


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