यह ताज्जुब की बात नहीं है कि जब स्वतंत्रता संग्राम और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के लिए दलित सवाल कोई अहमियत नहीं रखता था और यह सवाल उनके एजेंडे पर ही नहीं था तब भगतसिंह अछूत सवाल को एक अहम सवाल मान रहे थे. 'अछूत समस्या' लेख की शुरूआत में ही वे लिखते हैं, "एक अहम सवाल अछूत समस्या है. समस्या यह है कि 30 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं, उनके स्पर्श मात्रा से धर्म भ्रष्ट हो जायेगा, कुएं से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआं अपवित्र हो जायेगा. ये सवाल बीसवीं सदी में किए जा रहे हैं जिन्हें कि सुनते ही शर्म आ जाती है." अपने गहरे अध्ययन और तार्किक दृष्टिकोण की वजह से ही भगतसिंह दलितों की इस दयनीय और करुणाजनक स्थिति का इतिहास अपने आपको सर्वोत्तम कहने वाले हिंदू धर्म में सैकड़ों सालों से न्याय और व्यवस्था के नाम पर पोषित मनु द्वारा बनाई गई वर्णवादी व्यवस्था के भीतर खोजते हैं जो तथाकथित हिंदू धर्म के उच्च वर्ण के लोगों के दिलों-दिमाग में घर कर गई है. वह यह जान जाते हैं कि हिंदू धर्म वर्णवादी व्यवस्था के आधार पर खड़ा है और इसकी संचालक है उच्चवर्णीय ब्राह्मणवादी राजनीति और संस्कृति जिसका सहारा लेकर दलितों का सामाजिक और आर्थिक शोषण किया जाता रहा है.
भगतसिंह यह स्पष्ट करते हैं कि कैसे ब्राह्मणों और उच्चवर्णी अभिजनों ने धर्म के नाम पर निम्न कोटि के कामों में देश की गरीब और लाचार जनता को लगाया और उन्हें अस्पृश्य करार कर दिया. भगतसिंह लिखते हैं, "आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया और उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं उनसे निम्न कोटि के काम करवाने लगे. साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें. तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्वजन्म के पापों का फल है. अब क्या हो सकता है? चुपचाप दिन गुजारो. इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गये. लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया है. मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया. आत्मविश्वास एवं स्वावलंबन की भावनाओं को समाप्त कर दिया. बहुत दमन और अन्याय किया."
उस समय हिंदू धर्म में गहरा विश्वास रखने वाले कांग्रेस के दिग्गज नेता तक इतनी हिम्मत नहीं कर सकते थे कि दलितों की अमानवीय स्थिति के लिए हिन्दू धर्म को जिम्मेदार ठहरा पाते. ऐसे समय में भगत सिंह ही अकेले ऐसे थे जिन्होंने ऐसी हिम्मत दिखाई और हिंदू धर्म को, उसके ठेकेदारों को दलितों की अमानवीय स्थिति के लिए स्पष्ट तौर पर जिम्मेदार ठहराया. ऐसा ही काम बाद में भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में डा. अम्बेडकर ने किया. आगे चल कर भगतसिंह हिन्दू धर्म के पाखण्ड, ढोंग, अंधविश्वास और अमानवीयता वाले चरित्र का उदघाटन करते हैं. "मानवता की दुहाई देने वाला हिंदू धर्म इतना नाजुक है कि वह किसी इंसान के छू लेने भर से भ्रष्ट हो जाता है. उसमें पशुओं की पूजा उपासना को तो महत्व दिया जाता है. उनके आगे धूपबत्ती जलाई जाती है. फूल-फल चढ़ाया जाता है. मगर एक इंसान को इंसान होने का दर्जा तक नहीं दिया जाता है. उसे मानवीय गरिमा और अधिकारों तक से वंचित कर दिया जाता है."
स्वतंत्रता संग्राम में उभार आने से पहले कई धार्मिक व सुधारवादी आंदोलन पूरे देश में कई समाज सुधारकों द्वारा चलाये जा रहे थे. उन्होंने दलितों की स्थिति में बदलाव लाने के लिए सुधारवादी रास्तों को अपनाया था. यह सच है कि उन्होंने अपनी विभिन्न गतिविधियों के जरिए उच्च वर्ण वालों और हिंदू धर्म के अनुयायियों की आत्मा को झकझोरा था. ऐसे समाज सुधारकों में स्वामी दयानन्द का नाम महत्वपूर्ण है. उनके द्वारा चलाये गये आर्य समाज आंदोलन का पूरे जनमानस पर व्यापक प्रभाव पड़ा था. दलितों को उन्होंने आर्य समाज में शामिल किया और उन्हें 'जनेऊ' पहनाकर हिंदू धर्म में सम्मान दिलाने का प्रयास किया. लेकिन आर्य समाज भी अंतत: हिंदू धर्म की ही एक हिस्सा बन कर रह गया. वह वर्ण व्यवस्था की अभेद्य दीवार को ढाह पाने में नाकामयाब ही रहा.
दलितों को हिंदू धर्म के सामाजिक उत्पीड़न से मुक्ति पाने का एक रास्ता दूसरे थोड़े ज्यादा मानवतावादी दिखने वाले धर्मों में धर्मांतरण करके शामिल हो जाना दिखता था. इसलिए वे बड़ी तादाद में, बौद्ध धर्म, इस्लाम धर्म, सिख धर्म और आर्य समाज में गए भी. लेकिन इन धर्मों को भी अंतत: हिंदुत्ववादी सामाजिक सांस्कृतिक विषमताओं और धार्मिक मान्यताओं कर्म-कांडों ने ग्रस लिया और वहां भी छुआ-छूत, जात-पात पैदा हो गया. भगतसिंह लिखते हैं "लोग यह भी कहते हैं कि इन बुराईयों का समाधान किया जाये. बहुत खूब! छूत-अछूत को स्वामी दयानन्द ने जो मिटाया तो वे भी चार वर्णो से आगे नहीं जा पाये."
भगतसिंह अपनी परिपक्व क्रांतिकारी समझ और भारतीय समाज के गहरे अध्ययन के बल पर जान गये थे कि अछूत समस्या का समाधान धर्म परिवर्तन या किसी अन्य सुधारवादी रास्ते को अपनाने में नहीं है. सुधारवादी तरीकों से भारतीय समाज में गहरे जड़ जमाये वर्णवादी व्यवस्था को ढहाया नहीं जा सकता. उनकी नजर में दलित समस्या का समाधान धर्मातरण नहीं है और न ही किसी धर्म की सीमाओं के भीतर है, जिसमें वर्णव्यवस्था के अलावा सैकड़ों अन्य कुरीतियों की अभेद्य दीवारें हैं. ऐसे में भगतसिंह दलितों को धर्मों की सीमाओं से बाहर आकर संगठन बद्ध होकर सामाजिक क्रांति को सरंजाम देने की बात करते हैं.
Nilakshi Singh
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