BRING THE CHANGE THAT YOU WANT TO SEE IN THE WORLD WITH DISCUSSION AND ACTION ON INDIA NEED REVOLUTION.
Sunday, 13 January 2013
धर्म पर टिप्पड़ी के बाद दरअसल कुछ लोग मुझे नास्तिक और धर्म विरोधी समझने लगे है। लेकिन मै धर्म विरोधी तो बिलकुल भि नहीं। अगर आपका धर्म किसी को नुक्सान नहीं पहुचाता तो मै उसको कभी निशाना नहीं बनता। लेकिन अगर आप ऐसे धर्म को हि पुजेयेगा जो की शोषण और विषमता और अन्याय की वकालत करता हो तो मै क्या कोई भि बुद्धिजीवी उसको निशाना बनाएगा। और उतना हि नहीं आप अपना धर्म की बुरी बातो की भि वकालत करना शुरू कर दिजेयेगा की ये मेरे धर्म में लिखा है इस लिए सही है और यही होना चहिये तो उसकी तो आलोचना तो होगी ही। ये आपका कैसा धर्म है जो किसी व्यक्ति को अपने तरीके से जीने नहीं देता ? उसपे अपना धर्म थोपियेगा और किसी राष्ट्र का एक धर्म बनाने की बात किजेयेगा, व्यक्ति को अपने तरीके से जीने की आज़ादी छीनेयेगा तो सवाल तो उठेंगे ही न? धर्म जब तक आपके जीने का तरीका है तब तक वो इज्जत का पत्र है लेकिन जैसे ही वह धंधा बन जाता है तो उसकी ठोक-पिटाई तो होगी हि। मेरा भि धर्म है ,इसलिए मै आपके धर्म की इज्जत करता हूँ लेकिन तभी तक जब तक की वो अपका धर्म है लेकिन जब आप उसका धंधा शुरू कर देते है और उसके नाम पर भोली-भली जनता की ठगने और आपस में लड़ने लगते है और.उसे सत्ता के लिए इस्तेमाल करने लगते है तो उसका आलोचना तो स्वाभिक है । मुझे बाबासाहब कि एक पंक्ति याद आ रही है अपनी बात को एक वाक्य में कहने के लिए " I like the religion that teaches liberty, equality and fraternity.
पूरा देश नारी के ऊपर अत्याचार के खिलाफ खड़ा हुआ हि था, सभी उसके ऊपर हो रहे शोषण के कारन जानने की कोशिश कर ही रहे थे, बलात्कारियो के विरुद्ध कड़े दंड कि मांग हो ही रही थी, लोग समझने ही लगे हि थे कि नारी दुसरे दर्ज़ा कि नागरिक और वस्तु कैसे समझे जाने लगी। तभी मोहन भागवत ने अपना गन्दा मुँह खोला, और पश्चिमी संस्कृति को सारा दोष दे डाला । उस भागवत को इतना भी नहीं समझ में आया कि अगर पश्चिमी संस्क्रती इतनी बुरी है तो वंहा क्यों नहीं इतना बलात्कार होता ? क्या उससे कोई पूछेगा कि सति प्रथा, दहेज प्रथा, कन्यादान भि पश्चिमी संस्कृति कि देन है? क्या उससे कोई सवाल करेगा कि जब भारत बिल्कुल भी पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित नहीं था तब क्या औरतो को बराबरी थी, क्या उस समय औरतो की स्तिथि इस समय से अच्छी थी? क्या उन्हें नौकरी और शिक्षा की उस समय आज़ादी थी? उनकी जिंदिगीयो नर्क बना दिए ऐसे लोग ने और इनके धर्मो ने और बात करते है। बलात्कार इंडिया में होते है भारत में नही कहने वाला भागवत को क्या छोटे शहरो और गाँवों में होने वाले औरत के ऊपर अत्याचार नहीं दिखाई देता।
उसने तो उतना ही कहा लेकिन संत कहे जाने वाले आशाराम ने पीडिता को ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। लड़की के पिता ने जब आशाराम के खिलाफ बोला तो आशाराम ने उसे कुता बना दिया ये कहते हुए की हाथी चलते और कुत्ते भोकते है। और बलात्कारियो के खिलाफ कड़े कानून का भि विरोध किया। इनलोगों के ऐसे कृत्य से सभी लोग ताजुब है लेकिन मुझे बिलकुल भी नहीं। इनलोगों से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? यही वही संस्कृति है जिसे वो बचने की कोशिश कर रहे है। यही वो लोग है जो बलात्कारियो को जन्म देते है, ये कभी भी बलात्कारी को दोष नहीं देंगे। इनके अनुसार औरत को ही घर में छुप कर रहना चाहिए, इनके और इनके ग्रंथो के अनुसार औरत पुरुष को भड़काने वाली वस्तु है।मैं ऐसे लोगो से एक और सवाल करना चाहता हु कि लगभग 93 प्रतिशत बलात्कार घरवाले और रिस्तेदार ही करते है, तो वंहा पर कपडा और घर से बहार निकलना कैसे बलात्कार के कारण हो गए? मुझे ताजुब इनको देख कर नहीं बल्कि भारत की जनता को देख कर हो रहा है, उन लडकियों को देखकर हो रहा है जो कल तक कह रही थी की नज़र तुम्हारी बुरी और पर्दा मै करू? और आज क्या हो गया , शांत क्यों हो गयी? क्या इनके बयान के बाद तुम्हे भि लगने लगा कि औरत भड़काऊ वास्तु है वहि जिम्मेदार है , उसे ही रात में नहीं निकलना चहिये ? क्या तुमे भि लगने लगा कि नज़र दुसरे कि बुरी और पर पर्दा तुम्हे ही करना चहिये ? उन महिला संगठनों को क्या साप सूंघ गया जो राष्ट्रपति के बेटे के बयान पर बवाल कर रही थी? अब क्यों नही मोहन भागवत और आशाराम के कपडे फाड़ रही है और उसे माफ़ी मागने को मजबूर कर रही है?शर्म करो आरएसएस, शिवसेना और बजरंग दल के युवाओ क्या तुम्हे अपने बहनों की आज़ादी और बराबरी से ज्यादा मोहन भागवत प्यारा है? मुझे शर्म इन दोगलो पर नहीं बल्कि उस जनता और उन लडकियों पर आ रही है जो आशाराम की अभी भि भक्त बनी हुई है और धर्म और आस्था कि वजह से अपनी आज़ादी और समानता से समझौता कर रही है।
उसने तो उतना ही कहा लेकिन संत कहे जाने वाले आशाराम ने पीडिता को ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। लड़की के पिता ने जब आशाराम के खिलाफ बोला तो आशाराम ने उसे कुता बना दिया ये कहते हुए की हाथी चलते और कुत्ते भोकते है। और बलात्कारियो के खिलाफ कड़े कानून का भि विरोध किया। इनलोगों के ऐसे कृत्य से सभी लोग ताजुब है लेकिन मुझे बिलकुल भी नहीं। इनलोगों से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? यही वही संस्कृति है जिसे वो बचने की कोशिश कर रहे है। यही वो लोग है जो बलात्कारियो को जन्म देते है, ये कभी भी बलात्कारी को दोष नहीं देंगे। इनके अनुसार औरत को ही घर में छुप कर रहना चाहिए, इनके और इनके ग्रंथो के अनुसार औरत पुरुष को भड़काने वाली वस्तु है।मैं ऐसे लोगो से एक और सवाल करना चाहता हु कि लगभग 93 प्रतिशत बलात्कार घरवाले और रिस्तेदार ही करते है, तो वंहा पर कपडा और घर से बहार निकलना कैसे बलात्कार के कारण हो गए? मुझे ताजुब इनको देख कर नहीं बल्कि भारत की जनता को देख कर हो रहा है, उन लडकियों को देखकर हो रहा है जो कल तक कह रही थी की नज़र तुम्हारी बुरी और पर्दा मै करू? और आज क्या हो गया , शांत क्यों हो गयी? क्या इनके बयान के बाद तुम्हे भि लगने लगा कि औरत भड़काऊ वास्तु है वहि जिम्मेदार है , उसे ही रात में नहीं निकलना चहिये ? क्या तुमे भि लगने लगा कि नज़र दुसरे कि बुरी और पर पर्दा तुम्हे ही करना चहिये ? उन महिला संगठनों को क्या साप सूंघ गया जो राष्ट्रपति के बेटे के बयान पर बवाल कर रही थी? अब क्यों नही मोहन भागवत और आशाराम के कपडे फाड़ रही है और उसे माफ़ी मागने को मजबूर कर रही है?शर्म करो आरएसएस, शिवसेना और बजरंग दल के युवाओ क्या तुम्हे अपने बहनों की आज़ादी और बराबरी से ज्यादा मोहन भागवत प्यारा है? मुझे शर्म इन दोगलो पर नहीं बल्कि उस जनता और उन लडकियों पर आ रही है जो आशाराम की अभी भि भक्त बनी हुई है और धर्म और आस्था कि वजह से अपनी आज़ादी और समानता से समझौता कर रही है।
हम आपको बता ही रहे थे की धर्म और धर्मग्रंथो के अंदर क्या है। इसे भगवान् ने नहीं बल्कि कुछ इंसानों अपने निजी लाभ और खुद का वर्चस्व बनाये रखने के लिए बनया। तभी मोहन भागवत और आशाराम जैसे धर्मरक्षक और धर्म गुरुओ ने अपने कपडे खुद उतरने शुरू कर दिए और दिखा दिया की धर्म में क्या है , ये कभी भी औरत को सामान और बराबर समझ ही नहीं सकते। ये उनके ऊपर हो रहे शोषण के लिए उन्ही को जिम्मेदार ठहरायेंगे, उनके कपड़ो,उनकी आज़ादी को जिम्मेदार कहेंगे। इनके हिसाब से स्त्री को हमेशा पिता, पति या पुत्र के अधिन रहना चाहिए। ये उन्लोगो ने खुद शाबित कर दिया। ये हमेशा से नारी शिक्षा के विरोधी रहे इन्होने यहाँ तक की एक प्रथा चलाया था जिसके अनुसार अगर कोई स्त्री पढ़ती है तो उसका पति मर जायेगा। महात्मा फुले और सावित्री बाई फुले के आने के देश में पहला लडकियों के लिए स्कूल खोल गया। इनके अनुसार स्त्री को घर में ही रहना चाहिए और घर के काम काज ही करने चाहिए। ये मनुस्मृति को पूजने की बात करते है अगर कोई स्त्री को मनुस्मृति पढने का मौका मिले तो जरुर पढ़ कर देखे। आपको खुद आपकी बर्बादी और पिछड़ेपन का कारण मिल जायेगा।
-राहुल एक विद्रोही
-राहुल एक विद्रोही
मुझे लगता है की बहुत से लोग सिर्फ इसलिए धार्मिक है क्योकि उन्हें लागता है कि भगवान् या अल्लाह ने धर्म बनाया और धर्म ग्रन्थ लिखे। जिस दिन इनको ये बात समझ में आ जायेगी कि एक भगवान् दो तरह की बाते कैसे कर सकता है वह भी बिलकुल विपरीत और भगवान् को इतना कम ज्ञान ज्ञान कैसे हो सकता है कि वह कही लिखेगा पृथ्वी तस्तरी की तरह है और शेष नाग पर टिकी हुई है और कही कहेगा की अंडे की तरह है, उस दिन धर्म के दुकानपर ताला लग जायेगा। लोग पता नहीं भगवान् को इतना जालिम और पागल क्यों समझते है कि वह पिछले जन्म कि सजा इस जन्म में देगा और वह भी उस गलती की जिसका व्यक्ति को पता ही नहीं। वह स्त्री विरोधी कैसे हो सकता है वह कैसे कह सकता है की स्त्री बहुमुल्य अमानत है यानि वास्तु है जिसे वश में रखने के लिए आप मार-पिट भी सकते है। वह औरत और मर्द के लिए अलग नियम कैसे बना सकता है कि एक आदमी जितनी चाहे उतनी शादी कर ले पर विधवा औरत को एक शादी का भि अधिकार नहीं। नहीं वह अपने बच्चो के साथ सौतेला व्यवहार नहीं कर सकता?? अगर वह ऐसा करता है तो मै उसकी भक्ति सिर्फ इस लिए नहीं कर सकता की उसने मुझे बनाया है। जैसे की एक माँ अगर अपने बच्चे को जन्म दे कर , वो उसे मरने के लिए फेक देती है तो वह माँ भक्ति की पात्र नहीं। उसी प्रकार अगर आप कहेंगे की ईश्वर इतना बुरा और जालिम है, तो मै ऐसे इश्वर का विद्रोह करता हूँ। दोस्तों भगवान् रास्ता दिखने वाला है भटकने वाला नहीं जो ऐसी फिजूल की बाते करेगा। उसने हमें सोचने के लिए विवेक दिया ताकि हम किसी की कही बातो पर विश्वास न कर के तर्क और तथ्य के आधार पर कोई बात माने। अगर उसे बाबाओ/ पंडित-पोंगियो/ मुल्लो/पादरियों को ही हमारे बिच में रास्ता दिखने के लिए भेजना होता तो फिर हमें दिमाग नहीं देता। शायद वह जनता हो की बहुत लोग धुर्त भी है और वो जानते है की मै कभी सामने नहीं आऊंगा और इस का बात का ये धुर्त फायदा न उठा ले इसीलिए उसने हमें दिमाग दिया होगा। आप सब इतिहास और विज्ञान पढ़कर भी क्यों नहीं समझते की धर्म कब आया और किस लिए आया? अगर नहीं जानते तो आपको इतिहास पढने की जरुरत है। फिर सब माजरा समझ में आ जायेगा। जिस दिन आप सब को ऐहसास हो जायेगा की भगवान् ने धर्म नहीं बनाया उस दिन सारी ढोंग-पाखंड की दुकाने बंद हो जाएँगी। जिस दिन आपको इस बात का एहसास हो जायेगा की भगवान् हर जगह है उस दिन आप मंदिर-मस्जिद और गिरजाघर जाना बंद कर देंगे और उस पर करोड़ो-अरबो लुटाना बंद कर के वह पैसा समाज को देंगे। जिस दिन आपको एहसास हो जायेगा कि कर्म ही पूजा है उस दिन आप उसकी घंटो बैठ कर भक्ति नहीं करेंगे। जिस दिन आपको एहसास हो जायेगा की सब कुछ दिया हुआ भगवान का ही है और भगवान आपके लड्डू का मोहताज़ नहीं उस दिन एक नयी दुनिया का ही निर्माण होगा जंहा समानता होगी, भाईचारा होगा , बराबरी और इन्साफ होगा।क्योकि वह आपका धर्म आपका दिमाग होगा , आपको गाइड कोई किताब और बाबा नहीं बल्कि आपका पाना दिमाग करेगा । मै ऐसे लेख इसी उम्मीद में लिख रहा हु और उनलोगों तक पहुचने कि ज्यादा कोशिश कर रहा हु जिन्हें इंसान से जयादा हिन्दू/ मुस्लिम और इसाई होने का गर्व है।
- राहुल एक विद्रोही
- राहुल एक विद्रोही
बात उस दिन की है जब मेरे कुछ मित्र नए साल के उत्सव मनाने की बात कर रहे थे। उन में से एक ने कहा की अरे लड़की अभी मरी है और तुम लोग नाच-गाने की बात कर रहे हो। दुसरे ने तपाक से बोला जश्न न मनाने से क्या होगा? अगर कुछ होगा तो सोच बदलने से होगा। मै उनकी बाते बैठ चुप-चाप सुन रहा था कि अचानक सभी शराब और शबाब की जुगाड़ की बात करने लगे। मै ये जनता हु कि इस जुगाड़ में सिर्फ मेरे मित्र ही नहीं बल्कि उस दिन आधा हिंदुस्तान लगा था। ये बात इसीलिए मुझे नहीं हजम नहीं हो रही थी की कल लडकियों की चिंता जताने वाले आज उन्हें शराब की तरह पदार्थ यानि "शबाब" समझ रहे थे। इनमे से मेरे कुछ वही मित्र थे जिन्होंने "देल्ली गैंग रपे " पर बड़ा ही आक्रोश और दुःख जताया था। इसलिए मैंने उनकी इस तरह की विचार के पीछे का कारन जानने की कोशिश की, हलाकि की ये सिर्फ उनका ही विचार नहीं था इसलिए मुझे ये बात समझने में देर नहीं लगी की आखिर ऐसे सुविचार लोगो के अन्दर कैसे आते है? लोग आखिर अपनी तरह दिखने वाले इन्सान को शराब की तरह कैसे समझने लगे? मुझे ये बात पता थी की आज नया-नया औरतो को शबाब यानि "भोग की वास्तु" और "वासना को शांत करने की वास्तु" के रूप में नहीं समझा जा रहा बल्कि बहुत पुराने ज़माने से समझा जाता है। इसलिए मैंने इसका उत्तर इतिहास और धर्म में खोजने लगा। इतिहास में तो बस पता चला की लोग इस ज़माने में ये करते थे पर फिर भी समझ न आया की आखिर लोग ऐसा क्यों करने और समझने लगे। तभी मैंने धर्म को पढने का रुख बनाया सबसे पहले हिन्दू धर्मं की धर्मं ग्रंथो का अध्यन किया क्योकि भारत की संस्कृति और मानसिकता पर किसी दुसरे धर्मं के अपेक्षा हिन्दू धर्म का जयादा प्रभाव है। मुझे कुछ चौकाने वाले बाते मिले जैसे रामायण में लिखा " ढोल, गंवार ,शुद्र, पशु, नारी सब है ताडन के अधिकारी " , मुझे नहीं लगता की इसका अर्थ समझाने की जरुरत है। फिर उसी प्रकार गीता जिसे महान दर्शन कह कर प्रचलित किया गया है - उसमे भाग्यवाद और पुनः -जन्म जैसे सिद्धांतो को कूट-कूट कर भरा गया है। जिसकी वजह से नारियो और शुद्रो पर सदियों से आत्याचार होता रहा और वे चुप-चाप इसी वजह से सहते रहे की भगवान् ने गीता में लिखा है की " जो तुम्हारे भाग्य में लिखा है वही होगा और जो तुमने पिछले जन्म में कर्म किया उसी स्वरूप इस जन्म में फल मिलेगा। वाह क्या रचना है , नहीं-नहीं वाह क्या हथियार है जिसका मन उसका शोषण करो और वो आवाज़ भी नहीं करेगा/ करेगी ये समझ कर की उसकी भाग्य में ही ये लिखा है। मेरे प्रश्नों का उत्तर मिल गया था फिर भी मैंने खोज जारी रखा अब मैंने पवित्र पुस्तक कुरआन की ओर रुख किया वह जब मैंने अल्लाह-ताला का फरमान नारियो के लिए दिखा तो चौक गया उसमे तो यहाँ तक लिखा है की अगर आपकी पत्नी आपका बात नहीं मानती तो आप उसको वश में रखने के लिए मार-पीट भी सकते है , वो आपकी आमानत है। कई धर्मो में ये भी लिखा है की औरत को कभी आज़ाद नहीं छोड़ना चाहिए। उसे हमेशा पिता , फिर पति और फिर बेटा के अधीन रखना चहिये। अब आप समझ सकते है की किस वजह से लोग एक बेटे की चाह में बेटियों की लाइन लगा देते है। और आज भी ये सब जरी है मुझे इसका कारन सिर्फ इतना ही लगता है की किसी धर्मं-ग्रन्थ में लिख देने से आप गुलाम कैसे हो जाएँगी जब तक की आप उसको स्वीकार ना करे। बड़े दुःख की बात है कि आज ऐसी मानसिकता और परम्पराओ को ढोने का जिमा औरतो ने ही ले रक्खा है। आज पढ़ी-लिखी लडकिया भी इन धरम-ग्रंथो को वैसे ही इज्जत देते है जैसे की इसको बना कर शोषण करने वाले लोग। समस्या यही है की हम नहीं चाहते की शोषण और आत्याचार हो और हम ये भी नहीं चाहते कि हमरे धर्मो पर आंच आये। ये वैसी ही बात है अंडा भी न फूटे और ऑमलेट भी बन जाये। आज -कल मै अपने हर पोस्ट के माध्यम से यही बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि भगवान् और धर्मं में कोई रिश्ता नहीं। क्यों की भगवान् इतना क्रूर और पागल नहीं हो सकता की धर्म में ये सब लिखेगा। और अपने ही बच्चो के बिच भेद भाव नहीं करेगा।
- राहुल एक विद्रोही
- राहुल एक विद्रोही
मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा कि मै धर्म को फॉलो करता हूँ , लेकिन आँख मूंद कर नहीं। मेरा उनके लिए जबाब सबके सामने क्योकि ये किसी एक व्यक्ति की बात नहीं। मै कहना चाहूँगा की ये कैसे हो सकता है की आप आंख खोल कर धर्म का पालन कर रहे है ?आपको धर्म की सब बाते पता है फिर तो आप उसी स्तिथि में फॉलो करेंगे जब आपको धर्म से कोई आर्थिक , सामाजिक या अन्य लाभ होगा। नहीं तो आप पागल थोड़ी न है की जो खुद को आच्छा नहीं लगेने वाला व्यव्हार धर्म के नाम पर दुसरो के साथ करेंगे। आप इतने बड़े पागल थोड़ी है जो इन्सान को धर्म के नाम पर काटयेगा, औरत को नीच और वास्तु मात्र बताने वाली पुस्तक को पुजियेगा?? अगर आप फॉलो कर रहे है तो आपको जरुर पता नहीं है की उसमे स्त्री विरोधी बाते लिखी है , उसमे पुनः-जन्म और भाग्यवाद के सिद्धांत भरे पड़े है। वही पुनः-जन्म और भाग्यवाद जिसकी वजह से हजारो सालो से स्त्री और शुद्रो के नाम पर इंसान का शोषण होता रहा और वे चुप-चाप यही समझ कर सहते रहे की ये उनके भाग्य में यही लिखा है और पिछले जन्म के कर्मो का फल है। वाह क्या तरीका अपनाया धर्मं वालो ने जिसके साथ जो मन आये वो करो और कहो की तुम्हारे भाग्य में यही लिखा है। आज भी किसी गरीब या दबे कुचले से पुछये की वो संघर्ष क्यों नहीं करता तो वो आपको यही कहेगा की भाग्य में ही ये लिखा है, जो लिखा है वो तो होना ही है। । अगर आप ये सब जानते हुए भी धर्म का पालन कर रहे है तो आपको सम्भोदित करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं। अगर मै आपको जल्लाद कहु तो जल्लाद भी कहेगा की हमें क्यों इनके साथ मिला रहे हो हम तो किसी अपराधी को फंसी पर लटकाते है, और ये लोग तो उस धर्म का समर्थन और पालन कर रहे है जो किसी जाती या स्त्री में जन्म लेने को ही पिछले जन्म का अपराध बताता हो। ये उस धर्म को पालन करने की बात करते है जिसकी वजह से सदियों तक औरतो और कुछ जाति के लोगो की जिंदिगी नर्क से भी बेकार हो गयी। क्योकि इस धर्म ने उनसे पढने का अधिकार छिन लिया,उनकी बराबरी का अधिकार छिन लिया , अगर वे वेद वाक्य सुन ले तो उनके कान में खौलते तेल डालने और अगर वे मंत्र उच्चारण कर दिया तो जिह्वा काटने जैसे दंड प्रवधान करता हो। नहीं नहीं आप ऐसे धर्म को जरुर नहीं जानते नहीं तो आप कभी गलती से भी ऐसे धर्म को फॉलो करने की बात नहीं करते। आप ऐसे धर्म को कैसे पालन कर सकते है जो मनुष्य के छूने मात्र से अपवित्र हो जाता है और फिर किसी जानवार के मूत्र से पवित्र होता हो?? आप ऐसे धर्म को फॉलो करने की बात कैसे कर सकते है जो की औरत को वश में रखने के लिए मरने-पीटने तक की वकालत करता हो। ऐसा धर्मं भी है जो की किसी भी गलती की माफ़ी उतने दाम के "कॉन्फेशन लेटर" यानि पैसे लेकर देते थे। आप ऐसे धर्मो को आँख खोल कर कैसे पालन कर सकते है जो हमेशा से विज्ञान और प्रगति के विरुद्ध रहा हो?? आप जरा कल्पना कीजिये की बिना विज्ञान का विकास के जिंदिगी कैसी होती। यूरोपियन देशो के धर्मो ने कई वैज्ञानिक की जान सिर्फ इसलिए ले ली क्योकि उन्होंने अपने खोज,तर्क और तथ्य के आधार पर कुछ कहा जो की आपके धर्म में लिखी बातो की विपरीत निकली जिसे अपने अपने मन से गढ़ था और का भगवान् का नाम लगा दिया था । जैसे की गैलिलियो को सिर्फ इस बात के लिए फांसी मिली क्योकि उसने कहा था कि सूर्य पृथ्वी के चक्कर नहीं लगाती बल्कि पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है। आर्यभट को इस लिए बहिष्कार किया गया और सबके सामने बेज्जत किया गया क्योकि उसने कहा था की पृथ्वी तस्तरी की तरह नहीं और नहीं किसी विष्णु भगवान के शेष नाग पर टिकी हुई है बल्कि यह गोल है और हवा में लटकी हुई है। आपको शर्म नहीं आती टी.वी , मोबाइल, कंप्यूटर, हवाई जहाज़, रेल, बस , कार, मोटर-साइकिल, बिजली और अन्य अविषकार प्रयोग करते हुए जब आप उसके विरोध करने वाले के फॉलो करने की बात करते है। भाग्य और भविष्य वाले बाबा भी आज कंप्यूटर का प्रयोग कर रहे है आज उनकी दिव्या दृष्टि कहा गयी? जो साधू-संत इतने दूर बैठे भगवान से मन ही मन बात कर लेते है उन्हें भी आज मोबाइल कि जरुरत है। नहीं आपको इन सभी बातो का एहसास बिलकुल नहीं, नहीं तो आप कभी भी धार्मिक नहीं होते। आप बेशक बहुत पढ़े-लिखे है बड़े डॉक्टर ,इंजिनियर है, वैज्ञानिक है लेकिन आपको धर्मं और उसमे लिखी बातो का पता नहीं। अगर ये सब बाते पता है और आप फिर भी धर्म को फॉलो कर रहे है तो आपके अन्दर इन्सनियात मर गया है। अगर आपका ये कहना है की आप उसमे की अच्छी बातो को मानते है बुरी चीजों को नहीं तो मुझे एक बात बताये की बलात्कारियो कि एक बड़ी अच्छी आदत है वे समय के बड़े पक्के होते है, कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते। क्या उनके इन जैसी हज़ार अच्छी आदतों और बातो की वजह से उनको फॉलो करेंगे और इगनोरे कर देंगे की वे बलाताकरी मानसिकता के है??? क्या आपको दुनिया में और कोई व्यक्ति आदर्श बनाने को नहीं मिला। वैसा ही धर्म के मामले में है इसमें हज़ार अच्छी बाते लिखी हो लेकिन जो शोषण, उंच-नीच को हि सही ठहरा दिया , अब उससे बचा ही क्या ? दुनिया में अच्छी बाते सिखने के लिए और कोई किताब नहीं क्या? अगर अब आपका ये कहना होगा की सभी लोग मानते है इस लिए मै भी फॉलो करता हु तो मै ये कहूँगा की अपना दिमाग वैज्ञानिको को बेच दे अनुसंधान के लिए तो शायद कुछ प्रयोग में आ जाये। अगर आप मुझे इसके गली भी देंगे या मार भी देंगे तो दुःख नहीं।अगर मेरा सोंच का एक भी व्यक्ति ना हो फिर भी आप जैसो की भीड़ में खड़ा होकर जीने से अच्छा है अकेला मरना। मेरी बातो का कतई भी इरादा आपको ठेस पहुचने का नहीं है, बस मेरी इतनी ही चाहत है की आप अपने विचारो का पुनः-मूल्यांकन करे जिसे बदलने की जरुरत है।
-राहुल एक विद्रोही
-राहुल एक विद्रोही
सोयी हुई आवाम को जागना आसान है लेकिन जो आवाम सोने का नाटक कर रही है उसे कैसे जगा सकते है। कांशीराम जी की ये बात मुझे आचानक कल याद आई जब मेरे एक मित्र ने मुझे समझाया की इंसान की उत्पत्ति कैसे हुई, उन्होंने मुझे चार्ल्स डार्विन की थ्योरी के साथ-साथ मॉडर्न आइंस्टीन " स्टेफेन हकिंग्स " की भी थ्योरी भी बताई। ताजुब की हद तो तब हो गयी जब उन्होंने धर्मो का इतिहास भी बताया उन्हों मुझे बतया की वेदों में लिखा की वेद कराड़ो साल पुराने है जबकि उस समय इन्सान नहीं था पृथ्वी पर तब क्या भगवान् ने वेद डायनासोरोउस के लिए बनाया था? उन्होंने मुझसे यहाँ तक कह दिया की धर्मं इन्सान के द्वारा बनाये हुए है। फिर उन्होंने मुझसे ये भी कहा की आप ही बताये की अगर धर्मं भगवान् द्वारा बनाया होता तो क्यों किसी धर्मं में वही काम करना जायज होता तो किसी धर्मं में हरम कैसे होता? मैंने भी उनकी बत्तो को हामी भरी लेकिन चक्कर तो मुझे तब आने लगा जब उन्होंने अंत में चलते-चलते कहा की मेरे यहाँ कल हवन है आप जरुर आएगा , मैंने पुछा हवन किस बात की। तो वे कहने लगे की सामाजिक रीती रिवाज़ है, सभी करते है हम भी करते है तब मैंने तापक से पुछा फिर आपके ज्ञान का क्या ? क्या आप भी विज्ञानं के जानकार होकर ये अब कहेंगे की हवन करने से वातावरन शुद्ध होता है। उन्होंने कहा मेरी जानकारी से तो अशुद्ध होता है लेकिन अब क्या करे धर्म में है तो करना पड़ता है ।।। मेरे पास अब कोई शब्द नहीं बचे सिर्फ अचंभित आँखों से मै उन्हें देखता रहा और ये समझा की सिर्फ जानकरी होने से कोई शिक्षित नहीं हो जाता जब तक की उस शिक्षा का अपने जिंदिगी में प्रयोग न करे। अब मै समझ गया की हमलोगों अगर समाज बदलना है तो गंवारो से भी जायदा ध्यान शिक्षित लोगो पर देना होगा।
-राहुल
-राहुल
शोषण का बेहतरीन हथियार
जिस दिन उस पीडिता लड़की का देहांत हुआ, उस दिन मेरे एक मित्र ने अजब बात कही। उन्होंने ने कहा की जिसके भाग्य में जो लिखा है वही होता है, इस लड़की के भाग्य में यही लिखा था। इतना कह कर भी वे नहीं रुके फिर उन्होंने कहा की उसने पिछले जन्म में जरुर कुछ पाप किया होगा तभी उसके साथ ऐसा हुआ।
आप कहते हैं न की ब्राह्मणवाद क्या है ? इसी को कहते है ब्राह्मणवाद , भाग्यवाद, पुनः - जन्म , जाति-पति , वर्ण व्यवस्था , ढोंग-पाखंड , कर्म-कांड को ही सम्मलित कर के ब्राह्मणवाद कहते है। इन्ही सिद्धांतो और विचारो के आधार पर स्त्री और शुद्रो के साथ हजारो सालो तक शोषण हुआ और वे चुप-चाप यही समझ कर सहते रहे कि ये उनके भाग्य में लिखा है पिछले जन्म के कर्म के अनुसार। और मै धर्मं-ग्रंथो के खिलाफ भी इसीलिए हु कि उसमे ये सब कूट-कूट के भरी है। जिन्होंने सिर्फ सुना है वो कृपया एक बार खुद से अपने इन धर्मं ग्रंथो को पढ़ ले मुझे पूरा विश्वास है अगर आप समानता और मानव आज़ादी के पक्षधर होंगे तो मुझसे जायदा खिलाफ हो जाएंगे। आप उसी स्तिथि में इसको पूजते है या तो आप इसमें लिखे बातो को नहीं जानते या आपको धर्मं से किसी भी प्रकार का लाभ पहुचता हो। कुछ लोग और भी है जो की बेचारे धर्म को सिर्फ इसलिए श्रेष्ठ शाबित करने में लगे हुए है क्योकि उन्होंने इसे बिना विचार किये पहले ही अपना लिया है और सही मान लिया है। मै ये नहीं कहता की भगवान् नहीं मै ये कह रहा हु की भगवान् इतना क्रूर और पागल नहीं हो सकता की पिछले जन्म की सजा देगा और उस गलती की जिस गलती का हमें पता ही नहीं।
-राहुल
आप कहते हैं न की ब्राह्मणवाद क्या है ? इसी को कहते है ब्राह्मणवाद , भाग्यवाद, पुनः - जन्म , जाति-पति , वर्ण व्यवस्था , ढोंग-पाखंड , कर्म-कांड को ही सम्मलित कर के ब्राह्मणवाद कहते है। इन्ही सिद्धांतो और विचारो के आधार पर स्त्री और शुद्रो के साथ हजारो सालो तक शोषण हुआ और वे चुप-चाप यही समझ कर सहते रहे कि ये उनके भाग्य में लिखा है पिछले जन्म के कर्म के अनुसार। और मै धर्मं-ग्रंथो के खिलाफ भी इसीलिए हु कि उसमे ये सब कूट-कूट के भरी है। जिन्होंने सिर्फ सुना है वो कृपया एक बार खुद से अपने इन धर्मं ग्रंथो को पढ़ ले मुझे पूरा विश्वास है अगर आप समानता और मानव आज़ादी के पक्षधर होंगे तो मुझसे जायदा खिलाफ हो जाएंगे। आप उसी स्तिथि में इसको पूजते है या तो आप इसमें लिखे बातो को नहीं जानते या आपको धर्मं से किसी भी प्रकार का लाभ पहुचता हो। कुछ लोग और भी है जो की बेचारे धर्म को सिर्फ इसलिए श्रेष्ठ शाबित करने में लगे हुए है क्योकि उन्होंने इसे बिना विचार किये पहले ही अपना लिया है और सही मान लिया है। मै ये नहीं कहता की भगवान् नहीं मै ये कह रहा हु की भगवान् इतना क्रूर और पागल नहीं हो सकता की पिछले जन्म की सजा देगा और उस गलती की जिस गलती का हमें पता ही नहीं।
-राहुल
दलितों की समस्या और शहीद-ए-आजम भगतसिंह
यह ताज्जुब की बात नहीं है कि जब स्वतंत्रता संग्राम और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के लिए दलित सवाल कोई अहमियत नहीं रखता था और यह सवाल उनके एजेंडे पर ही नहीं था तब भगतसिंह अछूत सवाल को एक अहम सवाल मान रहे थे. 'अछूत समस्या' लेख की शुरूआत में ही वे लिखते हैं, "एक अहम सवाल अछूत समस्या है. समस्या यह है कि 30 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं, उनके स्पर्श मात्रा से धर्म भ्रष्ट हो जायेगा, कुएं से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआं अपवित्र हो जायेगा. ये सवाल बीसवीं सदी में किए जा रहे हैं जिन्हें कि सुनते ही शर्म आ जाती है." अपने गहरे अध्ययन और तार्किक दृष्टिकोण की वजह से ही भगतसिंह दलितों की इस दयनीय और करुणाजनक स्थिति का इतिहास अपने आपको सर्वोत्तम कहने वाले हिंदू धर्म में सैकड़ों सालों से न्याय और व्यवस्था के नाम पर पोषित मनु द्वारा बनाई गई वर्णवादी व्यवस्था के भीतर खोजते हैं जो तथाकथित हिंदू धर्म के उच्च वर्ण के लोगों के दिलों-दिमाग में घर कर गई है. वह यह जान जाते हैं कि हिंदू धर्म वर्णवादी व्यवस्था के आधार पर खड़ा है और इसकी संचालक है उच्चवर्णीय ब्राह्मणवादी राजनीति और संस्कृति जिसका सहारा लेकर दलितों का सामाजिक और आर्थिक शोषण किया जाता रहा है.
भगतसिंह यह स्पष्ट करते हैं कि कैसे ब्राह्मणों और उच्चवर्णी अभिजनों ने धर्म के नाम पर निम्न कोटि के कामों में देश की गरीब और लाचार जनता को लगाया और उन्हें अस्पृश्य करार कर दिया. भगतसिंह लिखते हैं, "आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया और उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं उनसे निम्न कोटि के काम करवाने लगे. साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें. तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्वजन्म के पापों का फल है. अब क्या हो सकता है? चुपचाप दिन गुजारो. इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गये. लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया है. मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया. आत्मविश्वास एवं स्वावलंबन की भावनाओं को समाप्त कर दिया. बहुत दमन और अन्याय किया."
उस समय हिंदू धर्म में गहरा विश्वास रखने वाले कांग्रेस के दिग्गज नेता तक इतनी हिम्मत नहीं कर सकते थे कि दलितों की अमानवीय स्थिति के लिए हिन्दू धर्म को जिम्मेदार ठहरा पाते. ऐसे समय में भगत सिंह ही अकेले ऐसे थे जिन्होंने ऐसी हिम्मत दिखाई और हिंदू धर्म को, उसके ठेकेदारों को दलितों की अमानवीय स्थिति के लिए स्पष्ट तौर पर जिम्मेदार ठहराया. ऐसा ही काम बाद में भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में डा. अम्बेडकर ने किया. आगे चल कर भगतसिंह हिन्दू धर्म के पाखण्ड, ढोंग, अंधविश्वास और अमानवीयता वाले चरित्र का उदघाटन करते हैं. "मानवता की दुहाई देने वाला हिंदू धर्म इतना नाजुक है कि वह किसी इंसान के छू लेने भर से भ्रष्ट हो जाता है. उसमें पशुओं की पूजा उपासना को तो महत्व दिया जाता है. उनके आगे धूपबत्ती जलाई जाती है. फूल-फल चढ़ाया जाता है. मगर एक इंसान को इंसान होने का दर्जा तक नहीं दिया जाता है. उसे मानवीय गरिमा और अधिकारों तक से वंचित कर दिया जाता है."
स्वतंत्रता संग्राम में उभार आने से पहले कई धार्मिक व सुधारवादी आंदोलन पूरे देश में कई समाज सुधारकों द्वारा चलाये जा रहे थे. उन्होंने दलितों की स्थिति में बदलाव लाने के लिए सुधारवादी रास्तों को अपनाया था. यह सच है कि उन्होंने अपनी विभिन्न गतिविधियों के जरिए उच्च वर्ण वालों और हिंदू धर्म के अनुयायियों की आत्मा को झकझोरा था. ऐसे समाज सुधारकों में स्वामी दयानन्द का नाम महत्वपूर्ण है. उनके द्वारा चलाये गये आर्य समाज आंदोलन का पूरे जनमानस पर व्यापक प्रभाव पड़ा था. दलितों को उन्होंने आर्य समाज में शामिल किया और उन्हें 'जनेऊ' पहनाकर हिंदू धर्म में सम्मान दिलाने का प्रयास किया. लेकिन आर्य समाज भी अंतत: हिंदू धर्म की ही एक हिस्सा बन कर रह गया. वह वर्ण व्यवस्था की अभेद्य दीवार को ढाह पाने में नाकामयाब ही रहा.
दलितों को हिंदू धर्म के सामाजिक उत्पीड़न से मुक्ति पाने का एक रास्ता दूसरे थोड़े ज्यादा मानवतावादी दिखने वाले धर्मों में धर्मांतरण करके शामिल हो जाना दिखता था. इसलिए वे बड़ी तादाद में, बौद्ध धर्म, इस्लाम धर्म, सिख धर्म और आर्य समाज में गए भी. लेकिन इन धर्मों को भी अंतत: हिंदुत्ववादी सामाजिक सांस्कृतिक विषमताओं और धार्मिक मान्यताओं कर्म-कांडों ने ग्रस लिया और वहां भी छुआ-छूत, जात-पात पैदा हो गया. भगतसिंह लिखते हैं "लोग यह भी कहते हैं कि इन बुराईयों का समाधान किया जाये. बहुत खूब! छूत-अछूत को स्वामी दयानन्द ने जो मिटाया तो वे भी चार वर्णो से आगे नहीं जा पाये."
भगतसिंह अपनी परिपक्व क्रांतिकारी समझ और भारतीय समाज के गहरे अध्ययन के बल पर जान गये थे कि अछूत समस्या का समाधान धर्म परिवर्तन या किसी अन्य सुधारवादी रास्ते को अपनाने में नहीं है. सुधारवादी तरीकों से भारतीय समाज में गहरे जड़ जमाये वर्णवादी व्यवस्था को ढहाया नहीं जा सकता. उनकी नजर में दलित समस्या का समाधान धर्मातरण नहीं है और न ही किसी धर्म की सीमाओं के भीतर है, जिसमें वर्णव्यवस्था के अलावा सैकड़ों अन्य कुरीतियों की अभेद्य दीवारें हैं. ऐसे में भगतसिंह दलितों को धर्मों की सीमाओं से बाहर आकर संगठन बद्ध होकर सामाजिक क्रांति को सरंजाम देने की बात करते हैं.
Nilakshi Singh
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