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Sunday, 13 January 2013
धर्म पर टिप्पड़ी के बाद दरअसल कुछ लोग मुझे नास्तिक और धर्म विरोधी समझने लगे है। लेकिन मै धर्म विरोधी तो बिलकुल भि नहीं। अगर आपका धर्म किसी को नुक्सान नहीं पहुचाता तो मै उसको कभी निशाना नहीं बनता। लेकिन अगर आप ऐसे धर्म को हि पुजेयेगा जो की शोषण और विषमता और अन्याय की वकालत करता हो तो मै क्या कोई भि बुद्धिजीवी उसको निशाना बनाएगा। और उतना हि नहीं आप अपना धर्म की बुरी बातो की भि वकालत करना शुरू कर दिजेयेगा की ये मेरे धर्म में लिखा है इस लिए सही है और यही होना चहिये तो उसकी तो आलोचना तो होगी ही। ये आपका कैसा धर्म है जो किसी व्यक्ति को अपने तरीके से जीने नहीं देता ? उसपे अपना धर्म थोपियेगा और किसी राष्ट्र का एक धर्म बनाने की बात किजेयेगा, व्यक्ति को अपने तरीके से जीने की आज़ादी छीनेयेगा तो सवाल तो उठेंगे ही न? धर्म जब तक आपके जीने का तरीका है तब तक वो इज्जत का पत्र है लेकिन जैसे ही वह धंधा बन जाता है तो उसकी ठोक-पिटाई तो होगी हि। मेरा भि धर्म है ,इसलिए मै आपके धर्म की इज्जत करता हूँ लेकिन तभी तक जब तक की वो अपका धर्म है लेकिन जब आप उसका धंधा शुरू कर देते है और उसके नाम पर भोली-भली जनता की ठगने और आपस में लड़ने लगते है और.उसे सत्ता के लिए इस्तेमाल करने लगते है तो उसका आलोचना तो स्वाभिक है । मुझे बाबासाहब कि एक पंक्ति याद आ रही है अपनी बात को एक वाक्य में कहने के लिए " I like the religion that teaches liberty, equality and fraternity.
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