Sunday, 13 January 2013

सोयी हुई आवाम को जागना आसान है लेकिन जो आवाम सोने का नाटक कर रही है उसे कैसे जगा सकते है। कांशीराम जी की ये बात मुझे आचानक कल याद आई जब मेरे एक मित्र ने मुझे समझाया की इंसान की उत्पत्ति कैसे हुई, उन्होंने मुझे चार्ल्स डार्विन की थ्योरी के साथ-साथ मॉडर्न आइंस्टीन " स्टेफेन हकिंग्स " की भी थ्योरी भी बताई। ताजुब की हद तो तब हो गयी जब उन्होंने धर्मो का इतिहास भी बताया उन्हों मुझे बतया की वेदों में लिखा की वेद कराड़ो साल पुराने है जबकि उस समय इन्सान नहीं था पृथ्वी पर तब क्या भगवान् ने वेद डायनासोरोउस के लिए बनाया था? उन्होंने मुझसे यहाँ तक कह दिया की धर्मं इन्सान के द्वारा बनाये हुए है। फिर उन्होंने मुझसे ये भी कहा की आप ही बताये की अगर धर्मं भगवान् द्वारा बनाया होता तो क्यों किसी धर्मं में वही काम करना जायज होता तो किसी धर्मं में हरम कैसे होता? मैंने भी उनकी बत्तो को हामी भरी लेकिन चक्कर तो मुझे तब आने लगा जब उन्होंने अंत में चलते-चलते कहा की मेरे यहाँ कल हवन है आप जरुर आएगा , मैंने पुछा हवन किस बात की। तो वे कहने लगे की सामाजिक रीती रिवाज़ है, सभी करते है हम भी करते है तब मैंने तापक से पुछा फिर आपके ज्ञान का क्या ? क्या आप भी विज्ञानं के जानकार होकर ये अब कहेंगे की हवन करने से वातावरन शुद्ध होता है। उन्होंने कहा मेरी जानकारी से तो अशुद्ध होता है लेकिन अब क्या करे धर्म में है तो करना पड़ता है ।।। मेरे पास अब कोई शब्द नहीं बचे सिर्फ अचंभित आँखों से मै उन्हें देखता रहा और ये समझा की सिर्फ जानकरी होने से कोई शिक्षित नहीं हो जाता जब तक की उस शिक्षा का अपने जिंदिगी में प्रयोग न करे। अब मै समझ गया की हमलोगों अगर समाज बदलना है तो गंवारो से भी जायदा ध्यान शिक्षित लोगो पर देना होगा।
-राहुल

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