Sunday, 13 January 2013

बात उस दिन की है जब मेरे कुछ मित्र नए साल के उत्सव मनाने की बात कर रहे थे। उन में से एक ने कहा की अरे लड़की अभी मरी है और तुम लोग नाच-गाने की बात कर रहे हो। दुसरे ने तपाक से बोला जश्न न मनाने से क्या होगा? अगर कुछ होगा तो सोच बदलने से होगा। मै उनकी बाते बैठ चुप-चाप सुन रहा था कि अचानक सभी शराब और शबाब की जुगाड़ की बात करने लगे। मै ये जनता हु कि इस जुगाड़ में सिर्फ मेरे मित्र ही नहीं बल्कि उस दिन आधा हिंदुस्तान लगा था। ये बात इसीलिए मुझे नहीं हजम नहीं हो रही थी की कल लडकियों की चिंता जताने वाले आज उन्हें शराब की तरह पदार्थ यानि "शबाब" समझ रहे थे। इनमे से मेरे कुछ वही मित्र थे जिन्होंने "देल्ली गैंग रपे " पर बड़ा ही आक्रोश और दुःख जताया था। इसलिए मैंने उनकी इस तरह की विचार के पीछे का कारन जानने की कोशिश की, हलाकि की ये सिर्फ उनका ही विचार नहीं था इसलिए मुझे ये बात समझने में देर नहीं लगी की आखिर ऐसे सुविचार लोगो के अन्दर कैसे आते है? लोग आखिर अपनी तरह दिखने वाले इन्सान को शराब की तरह कैसे समझने लगे? मुझे ये बात पता थी की आज नया-नया औरतो को शबाब यानि "भोग की वास्तु" और "वासना को शांत करने की वास्तु" के रूप में नहीं समझा जा रहा बल्कि बहुत पुराने ज़माने से समझा जाता है। इसलिए मैंने इसका उत्तर इतिहास और धर्म में खोजने लगा। इतिहास में तो बस पता चला की लोग इस ज़माने में ये करते थे पर फिर भी समझ न आया की आखिर लोग ऐसा क्यों करने और समझने लगे। तभी मैंने धर्म को पढने का रुख बनाया सबसे पहले हिन्दू धर्मं की धर्मं ग्रंथो का अध्यन किया क्योकि भारत की संस्कृति और मानसिकता पर किसी दुसरे धर्मं के अपेक्षा हिन्दू धर्म का जयादा प्रभाव है। मुझे कुछ चौकाने वाले बाते मिले जैसे रामायण में लिखा " ढोल, गंवार ,शुद्र, पशु, नारी सब है ताडन के अधिकारी " , मुझे नहीं लगता की इसका अर्थ समझाने की जरुरत है। फिर उसी प्रकार गीता जिसे महान दर्शन कह कर प्रचलित किया गया है - उसमे भाग्यवाद और पुनः -जन्म जैसे सिद्धांतो को कूट-कूट कर भरा गया है। जिसकी वजह से नारियो और शुद्रो पर सदियों से आत्याचार होता रहा और वे चुप-चाप इसी वजह से सहते रहे की भगवान् ने गीता में लिखा है की " जो तुम्हारे भाग्य में लिखा है वही होगा और जो तुमने पिछले जन्म में कर्म किया उसी स्वरूप इस जन्म में फल मिलेगा। वाह क्या रचना है , नहीं-नहीं वाह क्या हथियार है जिसका मन उसका शोषण करो और वो आवाज़ भी नहीं करेगा/ करेगी ये समझ कर की उसकी भाग्य में ही ये लिखा है। मेरे प्रश्नों का उत्तर मिल गया था फिर भी मैंने खोज जारी रखा अब मैंने पवित्र पुस्तक कुरआन की ओर रुख किया वह जब मैंने अल्लाह-ताला का फरमान नारियो के लिए दिखा तो चौक गया उसमे तो यहाँ तक लिखा है की अगर आपकी पत्नी आपका बात नहीं मानती तो आप उसको वश में रखने के लिए मार-पीट भी सकते है , वो आपकी आमानत है। कई धर्मो में ये भी लिखा है की औरत को कभी आज़ाद नहीं छोड़ना चाहिए। उसे हमेशा पिता , फिर पति और फिर बेटा के अधीन रखना चहिये। अब आप समझ सकते है की किस वजह से लोग एक बेटे की चाह में बेटियों की लाइन लगा देते है। और आज भी ये सब जरी है मुझे इसका कारन सिर्फ इतना ही लगता है की किसी धर्मं-ग्रन्थ में लिख देने से आप गुलाम कैसे हो जाएँगी जब तक की आप उसको स्वीकार ना करे। बड़े दुःख की बात है कि आज ऐसी मानसिकता और परम्पराओ को ढोने का जिमा औरतो ने ही ले रक्खा है। आज पढ़ी-लिखी लडकिया भी इन धरम-ग्रंथो को वैसे ही इज्जत देते है जैसे की इसको बना कर शोषण करने वाले लोग। समस्या यही है की हम नहीं चाहते की शोषण और आत्याचार हो और हम ये भी नहीं चाहते कि हमरे धर्मो पर आंच आये। ये वैसी ही बात है अंडा भी न फूटे और ऑमलेट भी बन जाये। आज -कल मै अपने हर पोस्ट के माध्यम से यही बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि भगवान् और धर्मं में कोई रिश्ता नहीं। क्यों की भगवान् इतना क्रूर और पागल नहीं हो सकता की धर्म में ये सब लिखेगा। और अपने ही बच्चो के बिच भेद भाव नहीं करेगा।

- राहुल एक विद्रोही

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