हम सचमुच घूरने वाले समाज के सदस्य हैं. दुनिया में गूगल पर सेक्स सर्च करने में हमारी टक्कर सिर्फ पाकिस्तान से है. जो जितना तहजीब वाला माना जाता है, उसे देखना और घूरना उतना ही ज्यादा भाता है. सेक्स शब्द सर्च करने वाले शहरों में लखनऊ अव्वल है तो पोर्न स्टार सनी लियोनी को इंटरनेट पर देखने की ख्वाहिश हरिद्वार में खूब उबाल मारती है. कामसूत्र इस देश का ऑल टाइम बेस्ट सेलर है और मोहल्ले के अंकलजी की सीडी की दुकान सुसंस्कृत लोगों के बूते नीली फिल्मों से लदी-फंदी रहती है. देखने और घूरने की परंपरा कोई आज की नहीं है. पूजा स्थलों में भी अक्सर संभोगरत मूर्तियां देव मूर्तियों के साथ बराबरी से होड़ करती हैं. देवदासी प्रथा इसी देश की हकीकत है. कई बाबाओं की प्रतिष्ठा सेक्स स्कैंडल्स की वजह से है.यह समाज इसलिए भी अद्भुत है क्योंकि यहां बलात्कार के लिए ‘इज्जत लुट जाने’ जैसे मुहावरे हैं. अपराध करने वाले की इज्जत नहीं लुटती, पीड़ित की इज्जत लुट जाती है. भाषा के संस्कार भी बेहद अजीब हैं. माता-पिता कन्या-दान करते हैं, मानो कोई वस्तु है, जिसे दान में देना है. बचपन से लड़कियों को पराया धन होने का पाठ पढ़ाया जाता है और कंधे झुकाकर चलने का सलीका सिखाया जाता है. आज भी देश के ढेरों कॉलेज ऐसे हैं, जहां लड़कियों को अलग बिठाया जाता है, मानो लड़की नहीं, छूत की बीमारी हो, कि छूने से कुछ बिगड़ जाएगा. लेकिन इन्हीं कॉलेजों के लड़के जाकर सिनेमा हॉल में अर्ली मॉर्निंग शो की सीटें भर देते हैं.ऐसे समाज में जो दिन-रात सेक्स की सोच में डूबा हो, वहां सेक्स पर बात करना इतना कठिन क्यों है? क्या हम सेक्स को लेकर डरे हुए लोग हैं. बलात्कार के आंकड़ों से क्राइम रिकॉर्ड को बुलंद रखने वाला मर्द समाज एक लड़की या महिला से बातचीत करते हुए इतना घबराता क्यों हैं? क्या लड़की उसके लिए सिर्फ एक मादा है, जिससे सेक्स करना है और कुछ नहीं? क्या वह उसी तरह की एक प्राणी नहीं है? एक लड़की जब अपनी पसंद से अपने लिए पार्टनर चुनना चाहती है, तो यह भयभीत समाज बौखलाकर उसकी हत्या तक कर देता है.सवाल यह है कि भारतीय समाज सेक्स से डरता है या महिलाओं की आजादी से?शुक्र है कि हमारा समाज धीरे-धीरे ही सही पर खुल रहा है. छोटे शहरों तक खुलेपन की एक हल्की सी लहर ही सही, पहुंच रही है. महिलाओं का वर्किंग स्पेस में आना और उनका आर्थिक रूप से समर्थ होना पूरे परिदृश्य को बदलने की ताकत रखता है. औरतों के लिए भी चुनने की आजादी अब वास्तविकता बन रही है. औरतों की आजादी भारतीय समाज को निर्णायक रूप से बदल देगी. स्त्री-पुरुष संबंधों का लोकतंत्र किसी भी समाज के सभ्य होने की दिशा में बढ़ने की पहली शर्त है. हम देर-सबेर इस शर्त को पूरा कर पाएंगे, ऐसी कामना की जानी चाहिए. फिर एक ऐसा समय भी आएगा जब हम बिना झिझक के और डरे बगैर सेक्स के बारे में भी बात कर पाएंगे. - BY- Dilip C Mandal
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