Sunday, 13 January 2013

पूरा देश नारी के ऊपर अत्याचार के खिलाफ खड़ा हुआ हि था, सभी उसके ऊपर हो रहे शोषण के कारन जानने की कोशिश कर ही रहे थे, बलात्कारियो के विरुद्ध कड़े दंड कि मांग हो ही रही थी, लोग समझने ही लगे हि थे कि नारी दुसरे दर्ज़ा कि नागरिक और वस्तु कैसे समझे जाने लगी। तभी मोहन भागवत ने अपना गन्दा मुँह खोला, और पश्चिमी संस्कृति को सारा दोष दे डाला । उस भागवत को इतना भी नहीं समझ में आया कि अगर पश्चिमी संस्क्रती इतनी बुरी है तो वंहा क्यों नहीं इतना बलात्कार होता ? क्या उससे कोई पूछेगा कि सति प्रथा, दहेज प्रथा, कन्यादान भि पश्चिमी संस्कृति कि देन है? क्या उससे कोई सवाल करेगा कि जब भारत बिल्कुल भी पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित नहीं था तब क्या औरतो को बराबरी थी, क्या उस समय औरतो की स्तिथि इस समय से अच्छी थी? क्या उन्हें नौकरी और शिक्षा की उस समय आज़ादी थी? उनकी जिंदिगीयो नर्क बना दिए ऐसे लोग ने और इनके धर्मो ने और बात करते है। बलात्कार इंडिया में होते है भारत में नही कहने वाला भागवत को क्या छोटे शहरो और गाँवों में होने वाले औरत के ऊपर अत्याचार नहीं दिखाई देता।
उसने तो उतना ही कहा लेकिन संत कहे जाने वाले आशाराम ने पीडिता को ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। लड़की के पिता ने जब आशाराम के खिलाफ बोला तो आशाराम ने उसे कुता बना दिया ये कहते हुए की हाथी चलते और कुत्ते भोकते है। और बलात्कारियो के खिलाफ कड़े कानून का भि विरोध किया। इनलोगों के ऐसे कृत्य से सभी लोग ताजुब है लेकिन मुझे बिलकुल भी नहीं। इनलोगों से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? यही वही संस्कृति है जिसे वो बचने की कोशिश कर रहे है। यही वो लोग है जो बलात्कारियो को जन्म देते है, ये कभी भी बलात्कारी को दोष नहीं देंगे। इनके अनुसार औरत को ही घर में छुप कर रहना चाहिए, इनके और इनके ग्रंथो के अनुसार औरत पुरुष को भड़काने वाली वस्तु है।मैं ऐसे लोगो से एक और सवाल करना चाहता हु कि लगभग 93 प्रतिशत बलात्कार घरवाले और रिस्तेदार ही करते है, तो वंहा पर कपडा और घर से बहार निकलना कैसे बलात्कार के कारण हो गए? मुझे ताजुब इनको देख कर नहीं बल्कि भारत की जनता को देख कर हो रहा है, उन लडकियों को देखकर हो रहा है जो कल तक कह रही थी की नज़र तुम्हारी बुरी और पर्दा मै करू? और आज क्या हो गया , शांत क्यों हो गयी? क्या इनके बयान के बाद तुम्हे भि लगने लगा कि औरत भड़काऊ वास्तु है वहि जिम्मेदार है , उसे ही रात में नहीं निकलना चहिये ? क्या तुमे भि लगने लगा कि नज़र दुसरे कि बुरी और पर पर्दा तुम्हे ही करना चहिये ? उन महिला संगठनों को क्या साप सूंघ गया जो राष्ट्रपति के बेटे के बयान पर बवाल कर रही थी? अब क्यों नही मोहन भागवत और आशाराम के कपडे फाड़ रही है और उसे माफ़ी मागने को मजबूर कर रही है?शर्म करो आरएसएस, शिवसेना और बजरंग दल के युवाओ क्या तुम्हे अपने बहनों की आज़ादी और बराबरी से ज्यादा मोहन भागवत प्यारा है? मुझे शर्म इन दोगलो पर नहीं बल्कि उस जनता और उन लडकियों पर आ रही है जो आशाराम की अभी भि भक्त बनी हुई है और धर्म और आस्था कि वजह से अपनी आज़ादी और समानता से समझौता कर रही है।

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